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गुरुवार, 20 नवंबर 2014

सरकार के आर्थिक सुधारों में विरोधी डाल सकते हैं रोड़ा

एक तरफ सरकार ने खजाने में रेवेन्यू इकठ्ठा करने के लिए हर जुगाड़ तैयार कर दिया है क्योंकि सरकार जिस तरह अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए जोर लगा रही है और जीएसटी और किसान विकास पत्र जैसी रेवेन्यू इकट्टा करने वाली योजनाएं ला रही हैं। वही दूसरी तरफ यह चौकाने वाली बात जरूर हो सकती है - आपने उद्योगपति अडानी को ऑस्ट्रेलिया में प्रधानमंत्री  के साथ जरूर देखा होगा लेकिन यह नहीं सोचा होगा कि साथ थे क्यों ? दरअसल खबर आई है, अडानी अपना कारोबार अब ऑस्ट्रेलिया में भी फैला रहे हैं।
 किसान विकास पत्र

नारा मेक इन इंडिया का है इसलिए देश का पैसा मेक इन ऑस्ट्रेलिया हो तो बात कुछ चौकाने वाली जरूर लगती है। हालाँकि कहा कांग्रेस ने है आप शायद भरोषा न करें लेकिन असल बात यह है कि  अदाणी समूह को ऑस्ट्रेलिया में माइनिंग के लिए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) ने 6200 करोड़ रुपये लोन दिया है। छह मल्टिनैशनल बैंकों ने देश के बाहर अदाणी के इस प्रॉजेक्ट को फाइनैंस करने से इनकार कर दिया, तब देश का पैसा ऑस्ट्रेलिया में लगाने का क्या औचित्य है।

 किसान विकास पत्र जिसमे  इस बचत योजना में निवेश किया गया धन आठ साल और चार महीने में दोगुना हो जाएगा। लेकिन आने वाले आठ साल तक पैसा वापस तो नहीं करना होगा इसलिए किसानो से पैसा मांगकर दुगना करने के लालच में खजाना भरने के मूड में है।  जब मार्किट में पहले ही इस तरह की कई योजनाएं पहले ही चलायी जा रही हैं। इसलिए सरकार की नई आर्थिक नीतियों में थोड़ा अनाड़ीपन जरूर दिख रहा।
 को लेकर रिजर्व बैंक ने साल 2011 में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि इससे ब्लैक मनी छिपाने में मदद मिलेगी।  वहीँ सरकार के एक और आर्थिक सुधार के कदम, गुड्स एंड सर्विस टैक्स जैसे महत्वपूर्ण कर सुधार कानून को पास करने में अब राज्यसभा में कांग्रेस समेत कई भाजपा के विरोधी दल जो मोदी से खार खाए बैठे हैं रोड़ा डालने की तैयारी में हैं। कांग्रेस का साफ़ कहना है कि यूपीए सरकार भी जीएसटी लायी थी लेकिन भाजपा ने इसे मोदी की अगुवाई में  पास नहीं होने दिया था इसलिए अब कांग्रेस का GST पर रुख क्या होगा इसका अनुमान लगाया जा सकता है।   

बुधवार, 12 नवंबर 2014

महाराष्ट्र में फिर शरद ऋतु

महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार के दौरान  नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने कई बार टेलीविजन कैमरों के सामने कहा था कि एनसीपी के साथ सरकार बनाने  का तो सवाल ही नहीं उठता और एनसीपी  को नेचुरल कर्रप्ट पार्टी और न जाने क्या -क्या कहा था। महाराष्ट्र को एनसीपी ने किस तरह लूटा यह भी कई चुनावी मंचों पर कहा था। लेकिन संयोग से अब उसी महाराष्ट्र में बीजेपी एनसीपी की सरकार बनने जा रही है। महाराष्ट्र में भाजपा की इस सरकार गठन को अब क्या बीजेपी की हार और एनसीपी की जीत कहा जा सकता है ? क्योंकि अब बीजेपी एनसीपी के साथ मिलकर ही सरकार बनाएगी।  एनसीपी सत्ता से दूर नहीं रह सकती इसलिए उसने भाजपा को अपने जाल में फंसा लिया और बीजेपी सिर्फ देखती रह गई।  क्योंकि अब एनसीपी का कोई भी महाराष्ट्र में कुछ नहीं कर पायेगा।

शरद पंवार 
लेकिन चुनौती बीजेपी के सामने आ खड़ी हुई है। बीजेपी अब सरकार बनाते ही कई तरफ से महाराष्ट्र के राजनीतिक चक्रव्यू में फंसती नजर आ रही है। दरअसल समूचे महाराष्ट्र में बीजेपी  ने चुनाव प्रचार के दौरान जिस एनसीपी के इरीगेशन स्कैम और लवासा प्रजेक्ट के भ्रष्टाचार को किसानो की भावनाओ से जोड़कर जिक्र किया और यहाँ तक कहा कि सत्ता में आये तो इनको जेल तक डालेंगे। अब उसी एनसीपी की वैशाखी पर जब सरकार चलेगी तो बीजेपी यह काम कैसे कर पायेगी ? दूसरी बड़ी मुस्किल बीजेपी की खुद की है 90 के दौर से बीजेपी अलग विदर्भ के समर्थन में रही है लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान मोदी साहब ने कहा की जब तक पीएम हूँ महाराष्ट्र को टूटने नहीं दूंगा ऐसे में अब बीजेपी करेगी क्या ? देखना होगा।

और तीसरी बड़ी मुश्किल यह है कि दरअसल दिल्ली में जब कांग्रेस के समर्थन से आम आदमी पार्टी ने सरकार बनाई तो भाजपा ने आप पर भ्रष्टाचारियों के साथ सरकार बनाने का आरोप लगाया था। अब वही कारनामा भाजपा ने कर दिखाया है। महाराष्ट्र में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर तो जरूर उभरी है लेकिन शरद पवार के जाल से नहीं बच पाई। क्योंकि अब महाराष्ट्र में न सिर्फ अब एनसीपी के घोटाले दबे रह जायेंगे बल्कि कारपोरेशन भी एनसीपी के हाथों में सुरक्षित रहेगा  दरअसल महाराष्ट्र में बीजेपी, शिवसेना का गठबंधन हो सकता था शिवसेना तैयार भी थी लेकिन भाजपा के घमंड ने इस संभावना को ख़त्म कर दिया। यह महाराष्ट्र की राजनीति का अहम दौर है जब शिवसेना महाराष्ट्र में अपने अस्तित्त्व की लड़ाई लड़ रही है और यही कारण है कि शिवसेना ने इसे बचाने  की कोशिश की लेकिन भाजपा ने इसे नाकमियाब कर दिया शिवसेना अगर सरकार में शामिल होती तो शायद भाजपा सरकार की चकाचौंध में गायब हो जाती इस बात को उद्धव ठाकरे अच्छी तरह जानते है इसीलिए शिवसेना ने सरकार में शामिल होने के लिए अहम पदों की मांग कर दी। लेकिन भाजपा के सामने भी दोहरी मुस्किल थी क्योंकि उन्होंने जनता से जो वादा किया था जिसमे अलग विदर्भ का मुद्दा भी था और शिवसेना इसके खिलाफ थी ऐसे में भाजपा सरकार के सरे अहम पद अपने पास रखना चाहती थी। लेकिन अब विपक्ष में रहकर शिवसेना को महाराष्ट्र की जनता के सामने रखने के लिए मुद्दा मिल गया है और शायद अपनी मराठी मानुष की थ्योरी के तले खुद को नए सिरे से ज़माने और खोई हुई पहचान को पाने का मौका मिल जायेगा  अब शिवसेना का मुद्दा यही होगा कि जिस एनसीपी ने महाराष्ट्र को लूटा और जनता ने भाजपा पर भरोषा किया अब वही भाजपा उसे एनसीपी के साथ सरकार चला रही है। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि जिस मोदी ने सबसे अलग राजनीति करके अच्छे दिन लेन का वाद किया, कांग्रेस को अछूत बताया अब भाजपा,कांग्रेस में क्या अंतर रह जायेगा। पहले कोंग्रस एनसीपी की सरकार थी अब भाजपा, एनसीपी  की सरकार होगी।             

शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

मेक इन इंडिया की नीति गरीबी मिटा पायेगी ?

जो आर्थिक नीति मनमोहन सिंह ने 1991 के बाद देश में चलाई जो कि अमेरिका ब्रिटेन की तर्ज पर  थी। जिसमे एफडीआई था, पीपी मॉडल था, हर सेक्टर में विदेशी निवेश था। उसने  भारत में  कॉर्पोरेट की चकाचौंध और तकनीक को तो बढ़ाया और सायद जीडीपी के आंकड़े भी बढे लेकिन उसने भारत के लघु उद्योगों को भी जड़ से समाप्त कर दिया। जब से भारत में नई आर्थिक नीतियां लागू हुई तबसे किसानो के लिए सरकार के आम बजट से पैसा काम होता गया। किसान जिन्दा रहे या न रहे किसी ने सोचा नहीं। अब मोदी भी मनमोहन की उसी खींची लकीर को पकडे हुए हैं। और दुनियाभर में घूम-घूम कर पैसा मांग रहे हैं भारत में अपने उद्योग लगाने को कह रहे हैं। लेकिन सरकारों को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत अमेरिका ब्रिटेन की तरह विकसित नहीं है इस नीति की दो योजनाएं कोयला घोटाले और 2जी घोटाले के रूप में फेल हो चुकी हैं।  कोर्ट ने कहा है कि सरकार कई इस आर्थिक नीति में ही खामी थी। तो क्या यह मान लिया जाए कि सरकारें जो नीतिया विकास के नाम पर बना रही है वह मात्र लूट का साधन है।
मोदी ने लांच किया मेक इन इंडिया 

 यहाँ आज भी आधी से ज्यादा आबादी रोटी पानी के लिए ही तरस रही है। इससे जीडीपी के आंकड़े तो जरूर बढ़ सकते है लेकिन गरीबी नहीं। सरकारें विकसित देशो की आर्थिक नीतियों की नक़ल तो कर सकती हैं लेकिन इस नई आर्थिक नीति को ऑपरेट नहीं कर पा रही है।  आधा ज्ञान हमेशा खरतरनक होता है। मनमोहन सिंह दुनिया के बड़े अर्थशास्त्री माने जाते हैं लेकिन विकसित अर्थव्यवस्था के मॉडल को भारत में लागू करने में इसीलिए फेल हो गए। तरक्की के लिए स्पेक्ट्रम वितरित किये लेकिन लूट मच गई, देश के पावर सेक्टर बढ़ने के लिए कोयले का निजीकरण किया लेकिन कॉर्पोरेट सारी सरकारी सम्पदा को चट कर गया। क्या मनमोहन सरकार को इस बात का ज्ञान नहीं रहा होगा कि एक -एक रूपये के लिए जो कारोबारी गरीबों को नहीं छोड़ते अगर उनको देश की अथाह सम्पदा लूटने की खुली छूट दी जाए तो वो ईमानदारी दिखाएंगे।  हुआ भी यही कोयला तो विकास के नाम पर निकला नहीं लेकिन ये कंपनियां मालामाल जरूर हो गई।  देश में बिजली की कीमतें आसमान छूने लगी कोयले की इतनी कमी कि विदेशो से आयत करना पड़े और देश अँधेरे में डूबने की कगार पर हो ऐसी विकासीय अर्थव्यवस्था क्या इस देश का भला करेगी।  और क्या गारंटी है कि जिस मेक इन इंडिया के नारे को मोदी लगा रहे हैं दुनिया भर को कहा जा रहा है कि भारत में आओ अपना सामान भारत में बनाओ और बेचो उसमे लूट नहीं मचेगी। याद रहे सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत को व्यापार के नाम पर ही विदेशियों ने गुलाम बना दिया था।    

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

सरकार की आर्थिक नीतियों पर कैसे भरोसा किया जाए

आज अमेरिका जाने से पहले दिल्ली के विज्ञानं भवन में प्रधानमंत्री मोदी निवेशकों को विश्वास दिलाने से नहीं चूके कि उनका पैसा डूबने नहीं दिया जायेगा। आखिर मोदी को यह कहने की जरूरत क्यों पड़ी? अगर सरकारी नीति के तहत कोई नवेशक पैसा लगाता है उसे डर किस बात का है। लेकिन सच यही है पहले सीएजी ने  कोयला आबंटन पर सवाल उठाया और अब सुप्रीम कोर्ट ने  1993 से 2010 में  आबंटित की गई 2014 कोल आबंटन को रद्द कर सरकारी नीति पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।  और कहा कि इस नीति के तहत सरकार और निजी कंपनियों के खेल में देश को एक लाख 86 हजार करोड़ का चूना लगा है। अब सुप्रीम कोर्ट  ने कहा है की  निजी कंपनियां अपना बोरिया -बिस्तर बांध लें यानी अब निजी कंपनियां कोयला नहीं निकाल पाएगी। यानि आर्थिक सुधार के लिए जो नीति आज बन रही है वह आने वाले समय में गलत हो सकती है।  ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले निवेशकों की चिता बढ़ा दी है कि आने वाले समय में कही उनका पैसा डूब न जाए।  

 1993 से इस देश में आर्थिक सुधर के नाम पर जो नीतियां बनी उसे देश में एक ऐसा कॉर्पोरेट का बाजार खड़ा हो गया जिसके तले देश की सम्पति को सरकारी तंत्र के तहत ही लूटा गया।
 देश की तस्वीर चाहे तो कोयले से ही बदल सकती थी। लेकिन कोयला खदानों में  होने वाली ठकेदारी की लूट को जब पहली बार इंदिरा गांधी ने देखा तो 1972 में देश की तमाम कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण होने के बाद 1993 तक निजी हाथो में यह सम्पति नहीं दी गई।  लेकिन 1993 क बाद यह मान लिया गया कि देश को आर्थिक गति देने के लिए कोयले को निजी हाथो में दे दिया जाये। और इस दौर में मनमोहन की यूपीए सरकार ने देश की कोयला खदानों को मिटटी के भाव आबंटित कर दिया। जिसमे से 175 खदानों का आबंटन रद्द कर दिया गया है। जिन भी कॉर्पोरेट घरानो की सरकारी तंत्र तक जान पहचान थी उन्होंने इस योजना का खूब लाभ उठाया।  जूते चप्पल बनाने से लेकर मीडिया हाउस चलने वाली कंपनियों ने भी कोयला खदाने अपने नाम कर ली। जिनको कोयला निकलने का कोई अनुभव नहीं था या फिर जिनके पास पावर प्लांट तो क्या लाइसेंस भीं नहीं था  उन्होंने कोयले की भारी मांग को देखते हुये कोयला खादान मुनाफा बनाने- कमाने के लिये अपने नाम करवा लिया। ऐसी 24 कंपनियां हैं, जिनके पास कोई पावर प्रोजेक्ट का नहीं है । लेकिन उन्हे खादान मिल गयी । 42 कंपनिया एसी है जिन्होंने खादानो की तरफ कभी झांका भी नहीं। लेकिन खादान अपने नाम कर खादान बेचने में लग गयी।
भारत में कोयले की अथाह सम्पति होने के बादभी देश भर में कोयले की कमी होने से बिजली का उत्पादन ठप्प होने की कगार पर है। बिजली की कमी से सीमेंट और स्टील उद्योग भी बुरे दौर से गुजर रहे हैं। अब बीते 21 बरस से लुटते इन कोयला खदानों को सुप्रीम कोर्ट ने डंडा चलाया है तो सवाल  यह भी खड़ा हो गया है कि सरकारी नीति के तहत जिन निवेशकों ने करोड़ों की सम्पति इन प्रोजेक्ट में लगाई तो क्या उनका पैसा डूब जायेगा ?  जिन बैंको ने पावर प्रोजेक्ट के नाम पर करोड़ों का कर्ज दिया उनका पैसा कहाँ से आएगा?  उन्होंने तो सरकार की नीति के तहत ही भरोसा करके कर्ज दिया था। यानी इस दौर में सरकार की आर्थिक नीति ही सवालो के घेरे में आ गई है इसीलिए मोदी विज्ञानं भवन में निवेशकों को ढांढस बंधाने से नहीं चूके।
सवाल यह भी है कि आर्थिक सुधारों के  नाम पर ट्रैक2 की जो पालिसी 1993 में मनमोहन ने अपनाई और वह नीति जिसमे अपने पारम्परिक उधोगों को ठोकर मारकर एफडीआई, पीपीपी मॉडल, बुलेट की रफ़्तार को ही तरजीह दी जा रही है तो यह रास्ता देश को चमका रहा है या इस देश की किसानी को ख़त्म कर समूचे भारत की पहचान को बदलना चाह रही है। क्या यह मान लिया जाए कई इस देश में विकास के नाम पर जो नीतियां बन रही है या जो बनती आई है वह विकास की चकाचौंध के नाम पर कार्पोरेट के लिए मात्र लूट का रास्ता खोलना है। क्योंकि इस देश में आज भी 60 प्रतिशत से ऊपर लोग कृषि पर निर्भर हैं और देश की जीडीपी में कृषि का योगदान मात्र 17 प्रतिशत भी मुश्किल से है जबकि आज़ादी से पहले देश की जीडीपी में 60 प्रतिशत से ऊपर कृषि का योगदान हुआ करता था।  सरकार का सारा ध्यान विदेशी निवेश और कॉर्पोरेट पर है। वहीँ दूसरी तरफ आजादी के 68 बरस बाद भी देश का एक तबका रोटी कपडा और मकान दो का ही नारा लगा रहा है।
 दरअसल इस देश में 1993 के बाद किसानो के लिए न तो कोई क्रांतिकारी कदम उठाया इसी का कारण है कि हजारों की संख्या में किसानो ने आत्महत्याएं की हैं। हर सरकार अपने कार्यकाल में विकासदर का आंकड़ा बढ़ाना चाहती है और उसके लिए उस 30 प्रतिशत कॉर्पोरेट पर ही पैसा लगाती है। लेकिन आप ही  बताएं कि किसी भी देश की तरक्की का पैमाना क्या होना चाहिए  मीटर पर जीडीपी का चार से पांच होना या देश के हर नागरिक के पेट में रोटी पहुचना और सुविधाएं देना।



बुधवार, 24 सितंबर 2014

मंगल पर भारत के कदम, और एक अजीब सी कल्पना

"जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने.....देता न दशमलव भारत तो चाँद पे जाना मुश्किल था , धरती और चांद की दूरी का अंदाज़ा लगाना मुश्किल था .......भगवान करे यह आगे बढे आगे बढे बढ़ता ही रहे 

 24 सितम्बर 2014 को सुबह 7 बज कर 17 मिनट पर पीएसऍलवी सी-25  के जैसे ही मंगल की कक्षा में स्थापित होने के सिग्नल श्रीहरिकोटा के सतीश भवन में व्याकुलता से बैठे वैज्ञानिकों तक पहुंचे तो भवन तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।  भारत ने एक ऐसी उपलब्धि  हासिल कर ली जो दुनिया के कई विकसित देश तक नहीं कर पाये। भारत  दुनिया का ऐसा पहला देश बन गया जिसने अपने पहले ही प्रयास में मंगल पर अपना डेरा जमा लिया। और एशिया का ऐसा पहला देश जो मंगल पर पंहुचा है।  इससे पहले चीन, जापान भी प्रयास कर चुके हैं लेकिन असफल रहे। एक सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इस मंगल मिशन में भारत ने मात्र 450 करोड़ (करीब 6 करोड़ 90 लाख डॉलर)  रूपये खर्च करके कामयाबी हासिल की है इतनी रकम तो एक हॉलीवुड की फिल्म बनाने में ही खर्च हो जाते हैं।

मंगल पर भारत के कदम 


 वैसे तो भारतीय वैज्ञानिको ने ज़ीरो, दशमलव,जैसे  दुनिया को कई अविष्कारों से रूबरू करवाया है लेकिन यह कामयाबी इसलिए खास है क्योंकि पृथ्वी के साथ - साथ ऐसे कई ग्रह हैं जिनके बारे में जानने का प्रयास दुनिया भर के वैज्ञानिक कई वर्षो से कर रहे हैं कि क्या इन ग्रहो में भी पृथ्वी जैसा जीवन है ? क्या इन ग्रहों में भी मनुष्य की तरह कोई प्राणी होगा ? इन ग्रहों के अंदर की दुनिया के बारे में जानने की उत्सुकता तब और भी बढ़ जाती है जब फिल्मो के जरिये ऐसे कई वैज्ञानिक रहष्यों का ज़िक्र किया जाता जाता जिसमे उड़नतस्तरी या दुसरे ग्रह के प्राणियों का पृथ्वी पर आना होता है। यह जानने की उत्सुकता बढ़ जाती है कि क्या हम कभी इन दूसरी दुनिया के प्राणियों से कम्युनिकेट कर पाएंगे। काश ऐसा हो पाता जब हम दूसरे ग्रहो के निवासियों से रूबरू हो पाते, कि क्या उन ग्रहो की दुनिया में भी फिल्मे बनती होगी। क्या उन ग्रहों में कोई क्रिकेट जैसा खेल खेला जाता होगा। क्या वहां भी नेता के घोटाले होते होंगे।  क्या वो भी मोबाइल या कंप्यूटर जैसी किसी तकनीक का इस्तेमाल करते होंगे।

पीएसऍलवी सी-25 मंगल की कक्षा में 

 क्या उन ग्रहो के लोग भी पृथ्वी और हमारे बारे में जानने के उत्सुक होंगे। आप को यह बता दें कि पृथ्वी 30 किमी प्रति सेकंड और मंगल 24 किमी प्रति सेकंड की रफ्तार से दौड़ रहा था। आप जानते हैं कि जिन कक्षाओं (आर्बिट्स) में दोनों ग्रह सूरज की परिक्रमा कर रहे हैं, वे आपस में पास-पास हैं। पृथ्वी की कक्षा अंदर पड़ती है, मंगल की बाहर। हरेक 780 दिनों के बाद पृथ्वी मंगल को ओवरटेक करती है। पृथ्वी से चलकर मंगल के निकट पहुंचने वाले किसी यान के पास चार विकल्प होते हैं। एक, वह मंगल के पास से होता हुआ निकल जाए और अंतरिक्ष में भटक जाए। दो, वह अपनी स्पीड को इतना कम कर ले कि मंगल की ग्रैविटी उसे पकड़ ले और वह मंगल के गिर्द घूमने लगे। तीन, वह मंगल से टकरा कर उस पर क्रैश लैंड कर जाए। चार, टकराने से पहले उल्टी दिशा में जोर लगा कर वह मंगल की सतह पर सॉफ्ट लैंड कर जाए। इसरो ने अपने मंगलयान के लिए नंबर दो वाले विकल्प को चुना है। यानी, मंगलयान मंगल पर उतरेगा नहीं, केवल मंगल के आसमान में एक नकली चांद बन कर उसकी परिक्रमा करने लगेगा और कई महीनों के लिए उस दुनिया में तांक-झांक करता रहेगा।

गुरुवार, 14 अगस्त 2014

गोल्ड तस्करी के चाचा चौधरी

सुनील रावत ( रेवेन्यू न्यूज़ के अगस्त अंक में प्रकाशित)

चाचा चैधरी, जी हाँ ! कंप्यूटर से तेज दिमाग वाले चाचा चैधरी का चरित्रा कार्टून काॅमिक्स के जरिये गढ़ने वाले प्राण कुमार शर्मा नहीं रहे। कंप्यूटर से तेज दिमाग वाले अपने कार्टून चाचा चैधरी और साबू के जरिये डायमंड और गोल्ड़ तस्करों के छक्के छुड़ाने वाले प्राण के निधन के साथ ही मानो तस्करों का सुनहरा दौर फिर लौट आया है और अब तस्कर ही चाचा चौधरी बन सरकार को चकमा दे रहे हैं। सरकार ने सोने पर बंदिश क्या लगाई कि 70 के दशक का तस्करी साम्राज्य लौट आया। दरअसल भारतीयों की सोने की ललक ने पूरे दक्षिण एशिया में तस्करों का जाल खड़ा कर दिया है साथ ही रिश्वत लेने की ताक में ड्राई-पोर्टों से लेकर एयरपोर्टों तक बैठे भ्रष्ट अफसरों को भी छप्पर-फाड़ के कमाने का मौका दे दिया है। इस बात का अंदाजा आप डायरेक्टरेट आॅफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस के ताजा आंकड़ों के से लगा सकते है। इस साल जनवरी से मई के बीच करीब 400 किलो सोना जब्त किया जा चुका है जोकि पिछले वर्ष के मुकाबले चार गुना ज्यादा है। वित्त वर्ष 2013-14 में तस्करी के 148 मामले सामने आए और लगभग 245 करोड़ रुपये सोने की जब्ती की गई। वहीं वित्त वर्ष 2012-13 में केवल 40 मामले सामने आए थे और विभाग ने 45 करोड़ रुपये का सोना जब्त किया था। सूत्रों के मुताबिक इस साल जनवरी से मई के बीच 3000 किलो तक सोना हर महीने अवैध रुप से भारत लाया जा रहा है, जोकि पिछले साल के इस समय के मुकाबले 450 फीसदी ज्यादा है, लेकिन सवाल इन सबके बीच यह भी है कि जब देश के तमाम एयरपोर्टों पर एक्स-रे मशीन से लेकर स्कैन और तमाम अत्याधुनिक सुविधाएं मौजूद है तो तस्करी का यह आंकड़ा इस हद तक कैसे जा पहुंचा है ? जब तस्करों के सामने पूरा कस्टम विभाग और इनके पास मौजूद आधुनिक सुविधाओं से लैस टेक्नाॅलाॅजी ही फेल है तो मोटे वेतनमान पाने वाले इन अफसरों की जरूरत ही कहां है।
जबकि इसके पीछे का एक सच यह भी है कि देश के कस्टम विभाग के भ्रष्ट अफसरों से लेकर तमाम इम्पोर्ट, एक्सपोर्ट से जुड़े लोग तस्करों से कदमताल करके इस मौके को हाथ से नहीं जाने देना चाहते हैं। वैसे तो अपने देश में सोने की तस्करी का इतिहास मनमोहन या मोदी के दौर का नहीं है यह नेहरू और अंग्रेजी हुकूमत में भी चरम पर था लेकिन फर्क आज की तस्करी का सच यह है कि तब तस्कर सरकारी पहरेदारों को चकमा देते थे और आज पहरेदार ही देश को धोखा देने लगे हैं।
देश के दो एयरपोर्टों दिल्ली का आईजीआई एयरपोर्ट और मुंबई शिवाजी एयरपोर्ट पर तस्करों का तांता लगा रहा लेकिन चैन्नई, कोच्चि, और अहमदाबाद एयरपोर्टों पर भी खाड़ी देशों से कुछ कम हाजी मस्तान नही उतरे। सूत्रों की माने तो इन एयरपोर्टों पर सरकारी सेवा करने वाले अधिकारी से लेकर सफाई कर्मचारियों तक तस्करों की सेवा में लगे हुए हैं। कई मामलों में देखा गया कि तस्कर एयरपोर्ट कीे ऐसे जगहों पर सोना रख देते है जो सीसीटीवी की पहुँच से दूर रहते है और यह सोना यहाँ काम करने वाले कर्मचारियों द्वारा तस्करों तक पहुंचाया जाता है। इसी का कारण है कि एयरपोर्ट के शौचालयों से लगातार सोना जब्त किया जा रहा है। पिछले समय में जितने मामले पकडे गए उनमे तस्करों ने ज्यादातर हवाई मार्ग का इस्तेमाल किया लेकिन ऐसा नहीं है कि तस्करी हवाई मार्ग से ही हो रही है। डीआरआई को एक ऐसे मामले में जिस खबर को विस्तृत रूप से रेवेन्यू न्यूज़ ने छापा था कि आईसीडी तुगलकाबाद में 4 कंटेनरों से शराब, सिगरेट, तथा चाइनीज ब्रांड टायर पर करोड़ों की कस्टम ड्यूटी चोरी पकड़ी गई थी। अब डीआरआई को गुप्त सूचना मिली है कि उस कंटेनर में सोने की तस्करी भी की जा रही थी खैर डीआरआई इस पूरे मामले की तहकीकात कर रही है लेकिन यह बात तो साफ है कि देश का ऐसा कोई भी एयरपोर्ट या ड्राईपोर्ट नही जहां तस्करी का खेल न चल रहा हो। सी.ए.डी पर भले ही सोने की पाबंधी का लाभ मिला हो लेकिन अवैध तरीके से आने वाले इस सोने ने सोने पर लगने वाली इम्पोर्ट ड्यूटी के असर को बेअसर कर दिया है क्योंकि इम्पोर्ट से नहीं लेकिन तस्करी का सोना भारतीय सोना व्यापारियों के लिए विकल्प बना हुआ है। कस्टम विभाग और राजस्व चोरी पकड़ने वाली खुफिया एजेंसी (डीआरआई) डायरेक्टरेट आॅफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस कीे नाक में भी तस्करों नें दम कर दिया है। सोने की तस्करी का आलम इतना भयावह है कि पिछले 5 महीनों में डायरेक्टरेट आॅफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस ने करीब 400 किलो सोना जब्त किया है लेकिन तस्करी किया गया सोना यानि जो पकड़ा नहीं गया उस सोने का आंकड़ा जब्ती से कहीं ज्यादा है और तस्करी का मात्रा एक प्रतिशत सोना ही पकड़ा जाता है।

शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

गांधी परिवार के त्याग को नटवर की चुनौती


एक शख्स गांधी नेहरू परिवार के साथ 50 से भी ज्यादा बरस सबसे  निकट रहता है और और गांधी परिवार को सोनिया गांधी से भी पहले से जानता समझता हो, और अगर वही शख्स सोनिया गांधी की देश के प्रति नियत को अपनी किताब वन लाइफ इज़ नॉट एनफ  (One life is not Enough) के जरिये झूठा कह दे तो बात गंभीर जरूर हो जाती है क्योंकि माना जाता है कांग्रेस का मतलब ही गांधी परिवार है और गांधी परिवार नहीं तो कांग्रेस है ही नहीं। अर्थात कांग्रेस का गांधी परिवार ऑक्सीज़न है
नटवर की किताब से सोनिया बैकफुट पर 
दरअसल नटवर सिंह ने अपनी किताब में इस बात का खुलासा किया है की सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री का पद अपने त्याग के कारण नहीं बल्कि राहुल गांधी की चेतावनी के कारण नहीं संभाला क्योंकि राहुल गांधी नहीं चाहते थे कि मेरे दादी और पापा की तरह मेरी माँ की भी हत्या हो जाए। नटवर सिंह के अनुसार राहुल गांधी ने यहाँ तक कह डाला था कि अगर वह प्रधानमंत्री का पद स्वीकार करती है तो वो किसी भी हद तक जा सकते हैं। लेकिन अगर उस दौर को याद करें तो सोनिया गांधी के इस फैसले को  कोंग्रेसियों ने यह कहकर गर्व महसूस किया था कि सोनिया गांधी को पद का लालच नहीं है और इसे त्याग बताया था। इसी का असर है की कांग्रेस लगातार देश में गांधी परिवार के नाम पर सत्ता पाती आई है। माना जाता है कि कांग्रेस का मतलब ही गांधी परिवार है और अगर कांग्रेस से गांधी परिवार को अलग कर दिया जाए तो कांग्रेस महत्व हीं नहीं है।
वैसे तो  पूर्व कोंग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सलाहकार संजय बारु भी अपनी किताब दी एक्सीडेंटल  प्राइम  मिनिस्टर में कांग्रेस सरकार पर आरोप लगा चुके है कि किस तरह मनमोहन सिंह के पीएम रहते हुए सोनिया गांधी सारे फैसले लिया करती थी।  लेकिन नटवर सिंह की किताब को लेकर सोनिया गांधी इसलिए भी तिलमिला उठी क्योंकि 50 बरस से नटवर सिंह नेहरू गांधी के दौर से परिवार के करीब रहे हैं और कांग्रेस सरकार में विदेश मंत्री भी रहे हैं और अगर कोई इतना करीबी गांधी परिवार की उस त्याग को अपनी किताब के जरिये झूठा साबित कर दे जिसके आसरे समूचे देश में कांग्रेस का महत्व है। हालाँकि नटवर सिंह ने अपनी किताब one life is not enough में नेहरू द्वारा सुरक्षा परिषद की सदस्यता ठुकराये जाने और राजीव गांधी की श्रीलंका में फेल डिप्लोमेसी का भी जकर किया है लेकिन सवाल सोनिया का इसलिए भी बड़ा है क्योंकि वर्तमान समय में कांग्रेस की धार लगातार कुंद होती जा रही है और गांधी परिवार ही एक ऐसी लकीर है जो कांग्रेस का ऑक्सीज़न बना हुआ है ऐसे में गांधी परिवार के देश को लेकर त्याग झूठा बताना कांग्रेस के लिए बड़ा झटका है।
लेकिन आगे का रास्ता अब आखिर है क्या ? नटवर सिंह की किताब ने राहुल गांधी को अब सीधे तौर पर जिम्मेदारी लेने को विवश कर दिया है जिसको लेने से वह हमेशा बचते रहे। यही रास्ता अब नटवर सिंह के खुलासे का सही जवाब होगा।