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गुरुवार, 25 सितंबर 2014

सरकार की आर्थिक नीतियों पर कैसे भरोसा किया जाए

आज अमेरिका जाने से पहले दिल्ली के विज्ञानं भवन में प्रधानमंत्री मोदी निवेशकों को विश्वास दिलाने से नहीं चूके कि उनका पैसा डूबने नहीं दिया जायेगा। आखिर मोदी को यह कहने की जरूरत क्यों पड़ी? अगर सरकारी नीति के तहत कोई नवेशक पैसा लगाता है उसे डर किस बात का है। लेकिन सच यही है पहले सीएजी ने  कोयला आबंटन पर सवाल उठाया और अब सुप्रीम कोर्ट ने  1993 से 2010 में  आबंटित की गई 2014 कोल आबंटन को रद्द कर सरकारी नीति पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।  और कहा कि इस नीति के तहत सरकार और निजी कंपनियों के खेल में देश को एक लाख 86 हजार करोड़ का चूना लगा है। अब सुप्रीम कोर्ट  ने कहा है की  निजी कंपनियां अपना बोरिया -बिस्तर बांध लें यानी अब निजी कंपनियां कोयला नहीं निकाल पाएगी। यानि आर्थिक सुधार के लिए जो नीति आज बन रही है वह आने वाले समय में गलत हो सकती है।  ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले निवेशकों की चिता बढ़ा दी है कि आने वाले समय में कही उनका पैसा डूब न जाए।  

 1993 से इस देश में आर्थिक सुधर के नाम पर जो नीतियां बनी उसे देश में एक ऐसा कॉर्पोरेट का बाजार खड़ा हो गया जिसके तले देश की सम्पति को सरकारी तंत्र के तहत ही लूटा गया।
 देश की तस्वीर चाहे तो कोयले से ही बदल सकती थी। लेकिन कोयला खदानों में  होने वाली ठकेदारी की लूट को जब पहली बार इंदिरा गांधी ने देखा तो 1972 में देश की तमाम कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण होने के बाद 1993 तक निजी हाथो में यह सम्पति नहीं दी गई।  लेकिन 1993 क बाद यह मान लिया गया कि देश को आर्थिक गति देने के लिए कोयले को निजी हाथो में दे दिया जाये। और इस दौर में मनमोहन की यूपीए सरकार ने देश की कोयला खदानों को मिटटी के भाव आबंटित कर दिया। जिसमे से 175 खदानों का आबंटन रद्द कर दिया गया है। जिन भी कॉर्पोरेट घरानो की सरकारी तंत्र तक जान पहचान थी उन्होंने इस योजना का खूब लाभ उठाया।  जूते चप्पल बनाने से लेकर मीडिया हाउस चलने वाली कंपनियों ने भी कोयला खदाने अपने नाम कर ली। जिनको कोयला निकलने का कोई अनुभव नहीं था या फिर जिनके पास पावर प्लांट तो क्या लाइसेंस भीं नहीं था  उन्होंने कोयले की भारी मांग को देखते हुये कोयला खादान मुनाफा बनाने- कमाने के लिये अपने नाम करवा लिया। ऐसी 24 कंपनियां हैं, जिनके पास कोई पावर प्रोजेक्ट का नहीं है । लेकिन उन्हे खादान मिल गयी । 42 कंपनिया एसी है जिन्होंने खादानो की तरफ कभी झांका भी नहीं। लेकिन खादान अपने नाम कर खादान बेचने में लग गयी।
भारत में कोयले की अथाह सम्पति होने के बादभी देश भर में कोयले की कमी होने से बिजली का उत्पादन ठप्प होने की कगार पर है। बिजली की कमी से सीमेंट और स्टील उद्योग भी बुरे दौर से गुजर रहे हैं। अब बीते 21 बरस से लुटते इन कोयला खदानों को सुप्रीम कोर्ट ने डंडा चलाया है तो सवाल  यह भी खड़ा हो गया है कि सरकारी नीति के तहत जिन निवेशकों ने करोड़ों की सम्पति इन प्रोजेक्ट में लगाई तो क्या उनका पैसा डूब जायेगा ?  जिन बैंको ने पावर प्रोजेक्ट के नाम पर करोड़ों का कर्ज दिया उनका पैसा कहाँ से आएगा?  उन्होंने तो सरकार की नीति के तहत ही भरोसा करके कर्ज दिया था। यानी इस दौर में सरकार की आर्थिक नीति ही सवालो के घेरे में आ गई है इसीलिए मोदी विज्ञानं भवन में निवेशकों को ढांढस बंधाने से नहीं चूके।
सवाल यह भी है कि आर्थिक सुधारों के  नाम पर ट्रैक2 की जो पालिसी 1993 में मनमोहन ने अपनाई और वह नीति जिसमे अपने पारम्परिक उधोगों को ठोकर मारकर एफडीआई, पीपीपी मॉडल, बुलेट की रफ़्तार को ही तरजीह दी जा रही है तो यह रास्ता देश को चमका रहा है या इस देश की किसानी को ख़त्म कर समूचे भारत की पहचान को बदलना चाह रही है। क्या यह मान लिया जाए कई इस देश में विकास के नाम पर जो नीतियां बन रही है या जो बनती आई है वह विकास की चकाचौंध के नाम पर कार्पोरेट के लिए मात्र लूट का रास्ता खोलना है। क्योंकि इस देश में आज भी 60 प्रतिशत से ऊपर लोग कृषि पर निर्भर हैं और देश की जीडीपी में कृषि का योगदान मात्र 17 प्रतिशत भी मुश्किल से है जबकि आज़ादी से पहले देश की जीडीपी में 60 प्रतिशत से ऊपर कृषि का योगदान हुआ करता था।  सरकार का सारा ध्यान विदेशी निवेश और कॉर्पोरेट पर है। वहीँ दूसरी तरफ आजादी के 68 बरस बाद भी देश का एक तबका रोटी कपडा और मकान दो का ही नारा लगा रहा है।
 दरअसल इस देश में 1993 के बाद किसानो के लिए न तो कोई क्रांतिकारी कदम उठाया इसी का कारण है कि हजारों की संख्या में किसानो ने आत्महत्याएं की हैं। हर सरकार अपने कार्यकाल में विकासदर का आंकड़ा बढ़ाना चाहती है और उसके लिए उस 30 प्रतिशत कॉर्पोरेट पर ही पैसा लगाती है। लेकिन आप ही  बताएं कि किसी भी देश की तरक्की का पैमाना क्या होना चाहिए  मीटर पर जीडीपी का चार से पांच होना या देश के हर नागरिक के पेट में रोटी पहुचना और सुविधाएं देना।



बुधवार, 24 सितंबर 2014

मंगल पर भारत के कदम, और एक अजीब सी कल्पना

"जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने.....देता न दशमलव भारत तो चाँद पे जाना मुश्किल था , धरती और चांद की दूरी का अंदाज़ा लगाना मुश्किल था .......भगवान करे यह आगे बढे आगे बढे बढ़ता ही रहे 

 24 सितम्बर 2014 को सुबह 7 बज कर 17 मिनट पर पीएसऍलवी सी-25  के जैसे ही मंगल की कक्षा में स्थापित होने के सिग्नल श्रीहरिकोटा के सतीश भवन में व्याकुलता से बैठे वैज्ञानिकों तक पहुंचे तो भवन तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।  भारत ने एक ऐसी उपलब्धि  हासिल कर ली जो दुनिया के कई विकसित देश तक नहीं कर पाये। भारत  दुनिया का ऐसा पहला देश बन गया जिसने अपने पहले ही प्रयास में मंगल पर अपना डेरा जमा लिया। और एशिया का ऐसा पहला देश जो मंगल पर पंहुचा है।  इससे पहले चीन, जापान भी प्रयास कर चुके हैं लेकिन असफल रहे। एक सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इस मंगल मिशन में भारत ने मात्र 450 करोड़ (करीब 6 करोड़ 90 लाख डॉलर)  रूपये खर्च करके कामयाबी हासिल की है इतनी रकम तो एक हॉलीवुड की फिल्म बनाने में ही खर्च हो जाते हैं।

मंगल पर भारत के कदम 


 वैसे तो भारतीय वैज्ञानिको ने ज़ीरो, दशमलव,जैसे  दुनिया को कई अविष्कारों से रूबरू करवाया है लेकिन यह कामयाबी इसलिए खास है क्योंकि पृथ्वी के साथ - साथ ऐसे कई ग्रह हैं जिनके बारे में जानने का प्रयास दुनिया भर के वैज्ञानिक कई वर्षो से कर रहे हैं कि क्या इन ग्रहो में भी पृथ्वी जैसा जीवन है ? क्या इन ग्रहों में भी मनुष्य की तरह कोई प्राणी होगा ? इन ग्रहों के अंदर की दुनिया के बारे में जानने की उत्सुकता तब और भी बढ़ जाती है जब फिल्मो के जरिये ऐसे कई वैज्ञानिक रहष्यों का ज़िक्र किया जाता जाता जिसमे उड़नतस्तरी या दुसरे ग्रह के प्राणियों का पृथ्वी पर आना होता है। यह जानने की उत्सुकता बढ़ जाती है कि क्या हम कभी इन दूसरी दुनिया के प्राणियों से कम्युनिकेट कर पाएंगे। काश ऐसा हो पाता जब हम दूसरे ग्रहो के निवासियों से रूबरू हो पाते, कि क्या उन ग्रहो की दुनिया में भी फिल्मे बनती होगी। क्या उन ग्रहों में कोई क्रिकेट जैसा खेल खेला जाता होगा। क्या वहां भी नेता के घोटाले होते होंगे।  क्या वो भी मोबाइल या कंप्यूटर जैसी किसी तकनीक का इस्तेमाल करते होंगे।

पीएसऍलवी सी-25 मंगल की कक्षा में 

 क्या उन ग्रहो के लोग भी पृथ्वी और हमारे बारे में जानने के उत्सुक होंगे। आप को यह बता दें कि पृथ्वी 30 किमी प्रति सेकंड और मंगल 24 किमी प्रति सेकंड की रफ्तार से दौड़ रहा था। आप जानते हैं कि जिन कक्षाओं (आर्बिट्स) में दोनों ग्रह सूरज की परिक्रमा कर रहे हैं, वे आपस में पास-पास हैं। पृथ्वी की कक्षा अंदर पड़ती है, मंगल की बाहर। हरेक 780 दिनों के बाद पृथ्वी मंगल को ओवरटेक करती है। पृथ्वी से चलकर मंगल के निकट पहुंचने वाले किसी यान के पास चार विकल्प होते हैं। एक, वह मंगल के पास से होता हुआ निकल जाए और अंतरिक्ष में भटक जाए। दो, वह अपनी स्पीड को इतना कम कर ले कि मंगल की ग्रैविटी उसे पकड़ ले और वह मंगल के गिर्द घूमने लगे। तीन, वह मंगल से टकरा कर उस पर क्रैश लैंड कर जाए। चार, टकराने से पहले उल्टी दिशा में जोर लगा कर वह मंगल की सतह पर सॉफ्ट लैंड कर जाए। इसरो ने अपने मंगलयान के लिए नंबर दो वाले विकल्प को चुना है। यानी, मंगलयान मंगल पर उतरेगा नहीं, केवल मंगल के आसमान में एक नकली चांद बन कर उसकी परिक्रमा करने लगेगा और कई महीनों के लिए उस दुनिया में तांक-झांक करता रहेगा।

गुरुवार, 14 अगस्त 2014

गोल्ड तस्करी के चाचा चौधरी

सुनील रावत ( रेवेन्यू न्यूज़ के अगस्त अंक में प्रकाशित)

चाचा चैधरी, जी हाँ ! कंप्यूटर से तेज दिमाग वाले चाचा चैधरी का चरित्रा कार्टून काॅमिक्स के जरिये गढ़ने वाले प्राण कुमार शर्मा नहीं रहे। कंप्यूटर से तेज दिमाग वाले अपने कार्टून चाचा चैधरी और साबू के जरिये डायमंड और गोल्ड़ तस्करों के छक्के छुड़ाने वाले प्राण के निधन के साथ ही मानो तस्करों का सुनहरा दौर फिर लौट आया है और अब तस्कर ही चाचा चौधरी बन सरकार को चकमा दे रहे हैं। सरकार ने सोने पर बंदिश क्या लगाई कि 70 के दशक का तस्करी साम्राज्य लौट आया। दरअसल भारतीयों की सोने की ललक ने पूरे दक्षिण एशिया में तस्करों का जाल खड़ा कर दिया है साथ ही रिश्वत लेने की ताक में ड्राई-पोर्टों से लेकर एयरपोर्टों तक बैठे भ्रष्ट अफसरों को भी छप्पर-फाड़ के कमाने का मौका दे दिया है। इस बात का अंदाजा आप डायरेक्टरेट आॅफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस के ताजा आंकड़ों के से लगा सकते है। इस साल जनवरी से मई के बीच करीब 400 किलो सोना जब्त किया जा चुका है जोकि पिछले वर्ष के मुकाबले चार गुना ज्यादा है। वित्त वर्ष 2013-14 में तस्करी के 148 मामले सामने आए और लगभग 245 करोड़ रुपये सोने की जब्ती की गई। वहीं वित्त वर्ष 2012-13 में केवल 40 मामले सामने आए थे और विभाग ने 45 करोड़ रुपये का सोना जब्त किया था। सूत्रों के मुताबिक इस साल जनवरी से मई के बीच 3000 किलो तक सोना हर महीने अवैध रुप से भारत लाया जा रहा है, जोकि पिछले साल के इस समय के मुकाबले 450 फीसदी ज्यादा है, लेकिन सवाल इन सबके बीच यह भी है कि जब देश के तमाम एयरपोर्टों पर एक्स-रे मशीन से लेकर स्कैन और तमाम अत्याधुनिक सुविधाएं मौजूद है तो तस्करी का यह आंकड़ा इस हद तक कैसे जा पहुंचा है ? जब तस्करों के सामने पूरा कस्टम विभाग और इनके पास मौजूद आधुनिक सुविधाओं से लैस टेक्नाॅलाॅजी ही फेल है तो मोटे वेतनमान पाने वाले इन अफसरों की जरूरत ही कहां है।
जबकि इसके पीछे का एक सच यह भी है कि देश के कस्टम विभाग के भ्रष्ट अफसरों से लेकर तमाम इम्पोर्ट, एक्सपोर्ट से जुड़े लोग तस्करों से कदमताल करके इस मौके को हाथ से नहीं जाने देना चाहते हैं। वैसे तो अपने देश में सोने की तस्करी का इतिहास मनमोहन या मोदी के दौर का नहीं है यह नेहरू और अंग्रेजी हुकूमत में भी चरम पर था लेकिन फर्क आज की तस्करी का सच यह है कि तब तस्कर सरकारी पहरेदारों को चकमा देते थे और आज पहरेदार ही देश को धोखा देने लगे हैं।
देश के दो एयरपोर्टों दिल्ली का आईजीआई एयरपोर्ट और मुंबई शिवाजी एयरपोर्ट पर तस्करों का तांता लगा रहा लेकिन चैन्नई, कोच्चि, और अहमदाबाद एयरपोर्टों पर भी खाड़ी देशों से कुछ कम हाजी मस्तान नही उतरे। सूत्रों की माने तो इन एयरपोर्टों पर सरकारी सेवा करने वाले अधिकारी से लेकर सफाई कर्मचारियों तक तस्करों की सेवा में लगे हुए हैं। कई मामलों में देखा गया कि तस्कर एयरपोर्ट कीे ऐसे जगहों पर सोना रख देते है जो सीसीटीवी की पहुँच से दूर रहते है और यह सोना यहाँ काम करने वाले कर्मचारियों द्वारा तस्करों तक पहुंचाया जाता है। इसी का कारण है कि एयरपोर्ट के शौचालयों से लगातार सोना जब्त किया जा रहा है। पिछले समय में जितने मामले पकडे गए उनमे तस्करों ने ज्यादातर हवाई मार्ग का इस्तेमाल किया लेकिन ऐसा नहीं है कि तस्करी हवाई मार्ग से ही हो रही है। डीआरआई को एक ऐसे मामले में जिस खबर को विस्तृत रूप से रेवेन्यू न्यूज़ ने छापा था कि आईसीडी तुगलकाबाद में 4 कंटेनरों से शराब, सिगरेट, तथा चाइनीज ब्रांड टायर पर करोड़ों की कस्टम ड्यूटी चोरी पकड़ी गई थी। अब डीआरआई को गुप्त सूचना मिली है कि उस कंटेनर में सोने की तस्करी भी की जा रही थी खैर डीआरआई इस पूरे मामले की तहकीकात कर रही है लेकिन यह बात तो साफ है कि देश का ऐसा कोई भी एयरपोर्ट या ड्राईपोर्ट नही जहां तस्करी का खेल न चल रहा हो। सी.ए.डी पर भले ही सोने की पाबंधी का लाभ मिला हो लेकिन अवैध तरीके से आने वाले इस सोने ने सोने पर लगने वाली इम्पोर्ट ड्यूटी के असर को बेअसर कर दिया है क्योंकि इम्पोर्ट से नहीं लेकिन तस्करी का सोना भारतीय सोना व्यापारियों के लिए विकल्प बना हुआ है। कस्टम विभाग और राजस्व चोरी पकड़ने वाली खुफिया एजेंसी (डीआरआई) डायरेक्टरेट आॅफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस कीे नाक में भी तस्करों नें दम कर दिया है। सोने की तस्करी का आलम इतना भयावह है कि पिछले 5 महीनों में डायरेक्टरेट आॅफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस ने करीब 400 किलो सोना जब्त किया है लेकिन तस्करी किया गया सोना यानि जो पकड़ा नहीं गया उस सोने का आंकड़ा जब्ती से कहीं ज्यादा है और तस्करी का मात्रा एक प्रतिशत सोना ही पकड़ा जाता है।

शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

गांधी परिवार के त्याग को नटवर की चुनौती


एक शख्स गांधी नेहरू परिवार के साथ 50 से भी ज्यादा बरस सबसे  निकट रहता है और और गांधी परिवार को सोनिया गांधी से भी पहले से जानता समझता हो, और अगर वही शख्स सोनिया गांधी की देश के प्रति नियत को अपनी किताब वन लाइफ इज़ नॉट एनफ  (One life is not Enough) के जरिये झूठा कह दे तो बात गंभीर जरूर हो जाती है क्योंकि माना जाता है कांग्रेस का मतलब ही गांधी परिवार है और गांधी परिवार नहीं तो कांग्रेस है ही नहीं। अर्थात कांग्रेस का गांधी परिवार ऑक्सीज़न है
नटवर की किताब से सोनिया बैकफुट पर 
दरअसल नटवर सिंह ने अपनी किताब में इस बात का खुलासा किया है की सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री का पद अपने त्याग के कारण नहीं बल्कि राहुल गांधी की चेतावनी के कारण नहीं संभाला क्योंकि राहुल गांधी नहीं चाहते थे कि मेरे दादी और पापा की तरह मेरी माँ की भी हत्या हो जाए। नटवर सिंह के अनुसार राहुल गांधी ने यहाँ तक कह डाला था कि अगर वह प्रधानमंत्री का पद स्वीकार करती है तो वो किसी भी हद तक जा सकते हैं। लेकिन अगर उस दौर को याद करें तो सोनिया गांधी के इस फैसले को  कोंग्रेसियों ने यह कहकर गर्व महसूस किया था कि सोनिया गांधी को पद का लालच नहीं है और इसे त्याग बताया था। इसी का असर है की कांग्रेस लगातार देश में गांधी परिवार के नाम पर सत्ता पाती आई है। माना जाता है कि कांग्रेस का मतलब ही गांधी परिवार है और अगर कांग्रेस से गांधी परिवार को अलग कर दिया जाए तो कांग्रेस महत्व हीं नहीं है।
वैसे तो  पूर्व कोंग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सलाहकार संजय बारु भी अपनी किताब दी एक्सीडेंटल  प्राइम  मिनिस्टर में कांग्रेस सरकार पर आरोप लगा चुके है कि किस तरह मनमोहन सिंह के पीएम रहते हुए सोनिया गांधी सारे फैसले लिया करती थी।  लेकिन नटवर सिंह की किताब को लेकर सोनिया गांधी इसलिए भी तिलमिला उठी क्योंकि 50 बरस से नटवर सिंह नेहरू गांधी के दौर से परिवार के करीब रहे हैं और कांग्रेस सरकार में विदेश मंत्री भी रहे हैं और अगर कोई इतना करीबी गांधी परिवार की उस त्याग को अपनी किताब के जरिये झूठा साबित कर दे जिसके आसरे समूचे देश में कांग्रेस का महत्व है। हालाँकि नटवर सिंह ने अपनी किताब one life is not enough में नेहरू द्वारा सुरक्षा परिषद की सदस्यता ठुकराये जाने और राजीव गांधी की श्रीलंका में फेल डिप्लोमेसी का भी जकर किया है लेकिन सवाल सोनिया का इसलिए भी बड़ा है क्योंकि वर्तमान समय में कांग्रेस की धार लगातार कुंद होती जा रही है और गांधी परिवार ही एक ऐसी लकीर है जो कांग्रेस का ऑक्सीज़न बना हुआ है ऐसे में गांधी परिवार के देश को लेकर त्याग झूठा बताना कांग्रेस के लिए बड़ा झटका है।
लेकिन आगे का रास्ता अब आखिर है क्या ? नटवर सिंह की किताब ने राहुल गांधी को अब सीधे तौर पर जिम्मेदारी लेने को विवश कर दिया है जिसको लेने से वह हमेशा बचते रहे। यही रास्ता अब नटवर सिंह के खुलासे का सही जवाब होगा।

शनिवार, 26 जुलाई 2014

298 यात्रियों सहित मलबे में तब्दील हुआ मलेशियाई विमान

नीदरलैंड्स की राजधानी एम्स्टर्डम से कुआलालम्पुर जा रहे मलेशियाई विमान बोइंग 777 को यूक्रेन के अलगाववादियों ने मार गिराया, इस घटना की सयुक्तराष्ट्र और अमेरिका ने कड़ी निंदा की है। कहा जा रहा है कि यूक्रेन के इन सेपेरिस्टों को रूस लगातार मदद करता आया है।  इसलिए इस घटना के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने रूस को जिम्मेदार ठहराया। मलेशियाई विमान को जिस बक मिशाइल से गिराया गया वह हवा में कई हज़ार किलोमीटर तक मार कर सकने वाली मिशाइल  बताई जा रही है।  तो सवाल यही उठ रहा है की आखिर विद्रोहियों के पास यह मिशाइल आई कहाँ से, क्योंकि इस तरह के हथियार तो रूसी ही बनाता है।  दरअसल कुछ समय पहले चीन ने अपनी विस्तार वादी नीति के तहत यूक्रेन में कुछ जगह ली है जिसको की रूस सही नहीं मान रहा है।  इसलिए वह यूक्रेन के क्रीमिया स्थित विद्रोहियों को लगातार समर्थ देता आया है। आगे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में इस घटना को लेकर क्या होगा? क्या क्रेमियां में रूसी समर्थित विद्रोहियों पर प्रतिबन्ध लगेगा देखना होगा।     

मार गिराये गए मलेशियाई विमान का मलबा 

 

उत्तराखंड उपचुनाव में भाजपा की हार मोदी के लिए चेतावनी

(दैनिक जनवाणी उत्तराखंड से साभार )
खोखले मंसूबों में पंख नहीं लगते। लुभावनी घोषणाओं के नखलिस्तान में उम्मीदों की बारिश नहीं होती। उत्तराखंड में विधानसभा  की तीन सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया है कि लुभावने सब्जबाग की उम्र लम्बी नहीं होती है। लोकसभा चुनाव से पूर्व भाजपा ने जितने भी  दावे किए और जो भी घोषणाएं की वह अभी तक घोषणाओं से आगे नहीं बढ़ पाई है। कई मामलों में तो मोदी सरकार समस्याओ के सामने दंडवत नजर आई। महंगाई भगाओ नाम की जिस नाव पर सवार होकर भाजपा ने चुनावी समंदर को पार किया उसी नाव में मोदी सरकार ने सत्तर छेद कर दिए।

 नतीजा सामने है। केन्द्र में मोदी की सरकार बनने के बाद देश में पहली बार विधानसभा  के तीन सीटों पर उपचुनाव हुए। भाजपा-कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर हुई और देवभूमि उत्तराखंड की सरजमीं इसका गवाह बनी। इसके बावजूद कि गत लोकसभा  चुनाव में इन सीटों पर भाजपा ने उल्लेखनीय बढ़त बनाई थी, महज ढाई महीने के बाद विस चुनाव हुए तो बीजेपी का पत्ता साफ हो गया। दरअसल यह सब उस राज्य में हुआ है जहां भाजपा खुद को ज्यादा सहज महसूस करती है। एनडीए के शासनकाल में ही उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ था। यहां पहली निर्वाचित सरकार भी  भाजपा की ही बनी थी। उसी उत्तराखंड के मतदाताओं ने भाजपा को खारिज कर दिया। ये नतीजे भाजपा के लिए संदेश भी  है और सबक भी । वह किसी भ्रम में ना रहे। उत्तराखंड के चुनावी नतीजे ने साफ कर दिया है कि सिर्फ मोदी लहर पर सवार होकर चुनाव नहीं जीते जा सकते। इस छोटे से प्रदेश ने भाजपा को एक बड़ा संदेश दिया है। भाजपा को समझना होगा कि राज्यों की जरूरतें, वहां के वाशिंदों की अपेक्षाएं और उम्मीदें अलग होती है।यह बात शीशे की तरह साफ हो गयी है कि सिर्फ नमो-नमो के सहारे जनता के दिलों पर राज नहीं किया जा सकता। यदि भाजपा को मोदी लहर पर सवार होकर ही राजनीति करनी है ऐसे में भाजपा को न केवल हाल में होने वाले विधानसभा  के चुनावों के लिए ठोस रणनीति बनानी होगी बल्कि  इस बात का प्रयास भी करना होगा कि लोस चुनाव से पूर्व किए गए वायदों को पूरा किया जाए। आगामी कुछ महीनों में बिहार समेत कई प्रदेशों में विधानसभा  का चुनाव प्रस्तावित है। ये वो राज्य हैं जहां भाजपा की सरकार नहीं है। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और गोवा की विधानसभा का आधा कार्यकाल बीत चुका है। यानी दो साल बाद इन राज्यों में भी चुनावी बिगुल बजना है। भाजपा को यदि इन तमाम राज्यों में जीत दर्ज करानी है तो उसे अपनी रणनीति बदलनी होगी। सब्जबाग दिखाकर जनता को लुभाने का वक्त अब भाजपा के लिए खत्म हो चुका है। उसे अब जमीन से जुड़ना होगा और जनता तक पहुंचना होगा। वह भी आश्वासनों के साथ नहीं बल्कि विकास की सुहानी तस्वीरों के साथ। पुरानी कहावत है, काम होने से ज्यादा आवश्यक है कि लोगों को यह महसूस हो कि काम हो रहा है। भाजपा ने जो दावे किए और जो वायदे किए उन्हें लेकर एक पल के लिए भी  नहीं लगा है कि उन वायदों पर अमल हो रहा है या भाजपा की ऐसी मंशा है। भाजपा की रणनीति से ऐसा आभास हो रहा है कि वह सिर्फ कांग्रेस को कोसकर सत्ता का सुख भोगना चाहती है। इससे काम नहीं चलेगा।
भाजपा चाहे तो हरीश रावत से यह सबक सीख सकती है। वह चाहे सीएम का सरकारी आवास छोड़कर बीजापुर गेस्ट हाउस में रहने का फैसला हो या फिर शपथ ग्रहण के तत्काल बाद आपदा प्रभावित क्षेत्रों का मैराथन भ्रमण हो।
हरीश रावत ने साबित किया कि पहाड़ और पहाड़ के वाशिंदों का दर्द उनका अपना दर्द है। गर्दन की चोट के कारण एम्स में भर्ती हरीश रावत अपना नामांकन करने तक के लिए प्रदेश में नहीं आए। यहां तक कि उन्होंने एक दिन भी  चुनाव प्रचार में भाग नहीं लिया। अलबत्ता जब उन्हें पता चला कि पहाड़ों पर लगातार बारिश हो रही है और सूबे में पिछले साल जैसे हालात पैदा हो रहे हैं तो वह अपनी बीमारी को भूलकर सीधे देहरादून दौड़े चले आए। हरीश के इस फैसले के पीछे उनकी सियासी रणनीति जो भी  रही हो, जनता ने यही समझा कि यह आदमी उनके बीच का है। इस हार में भाजपा के लिए भी संदेश है। संदेश यह है कि बिना मजबूत नेतृत्व के चुनावी रण में जनता के बीच ठहरना मुश्किल है। जीत हासिल करने के लिए मजबूत नेतृत्व बेहद जरूरी है। नरेन्द्र मोदी में संभावना दिखी तो जनता ने उन्हें हाथों हाथ लिया। भाजपा को यदि लम्बे समय तक खुद को राजनीति में स्थापित रखना है तो राज्यों में उसे अपना मजबूत नेतृत्व तैयार करना होगा।

बुधवार, 9 अप्रैल 2014

गवर्नेंस या मुसलमान बनाम हिन्दू

देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तरप्रदेश लोकसभा की 80 सीटें, हर कोई जानता है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही होकर जाता है। दरअसल 2014  के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश पर हर कोई सिर्फ इसलिए भी टकटकी लगाए नहीं बैठा है क्योंकि, इस चुनाव में नायक तौर पर पेश किये जा रहे मोदी और केजरीवाल, उत्तर प्रदेश की ही जमीन से टकरा रहे हैं बल्कि इसलिए भी क्योंकि उत्तरप्रदेश की पूरी लड़ाई हिन्दू बनाम मुसलमान हो चुकी है और अब इस टकराव का ऐलान मुजफरनगर दंगो के परिणाम स्वरुप खुले  तौर पर किया जा रहा है। देवबंद में जमीयत उलेमा-ए-हिंद के मुखिया मोहम्मद अरशद मदनी जिस बात का जिक्र कर गए कि भाजपा अगर सत्ता में आ गयी तो देश को बांट देगी इसलिए भाजपा को हराने के लिए गोलबंद हो जाओ।

सपा, बसपा, कांग्रेस को आगे बढ़ाओ लेकिन भाजपा और मोदी को रोको। उसका एक मतलब यह भी निकलता है कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम भाजपा के खिलाफ एकजुट हैं तो अन्य पार्टियों के हिन्दू वोटरों का धु्रवीकरण भी भाजपा में जमकर होगा। क्योंकि जब जब माइनाॅरिटी और मज्यूरिटी को बांटा गया है फायदा बहुसंख्यकों का ही हुआ है 2002 के बाद गुजरात इसका उदाहरण मान सकते हैं। इन सबके बावजूद उत्तरप्रदेश में अगर हिन्दू मुस्लिम समीकरण खुलकर सामने आते हैं तो जातीय समीकरण टूटेंगे अर्थात दलित, जाट. इत्यादि वोट भाजपा के ही मिलेंगे और भाजपा को उदितराज के जरिये भी दलित वोट मिल सकते है। इसका सीधा मतलब होगा भाजपा की जीत, लेकिन बनारस में जिस तरह मुरली मनोहर जोशी को हटाकर मोदी को लाया गया और लखनऊ में राजनाथ को, उससे भाजपा को पंडित वोटो के कटने का डर जरूर सता रहा होगा। बनारस में हिन्दू और मुसलमान वोटर बराबर हैं। कांग्रेस ने यहाँ कोई मजबूत उम्मीदवार खड़ा नहीं किया और यह भी कहा जा रहा है कि पिछली बार बसपा के टिकट पर चुनाव लडे़ मुख्तार अंसारी को इस बार यह कह कर मुसलमानो द्वारा किनारे किया जा रहा है कि सारे मुसलमान वोट मोदी को रोकने के लिए केजरीवाल के पक्ष में कर दिए जाएँ, और अगर ऐसा हुआ तो बनारस में मुकाबला दिलचस्प हो जाएगा।
 दरअसल जिस तरह मुस्लिम धर्म गुरुओ खासतौर पर जामा मस्जिद इमाम बुखारी साहब द्वारा भाजपा को रोकने का ऐलान खुले तौर पर किया जा रहा है और अमित शाह भी जो भाषा बोल गए, संकेत यही है कि हिन्दू, मुसलमान की आर-पार की लड़ाई उत्तर प्रदेश के चुनाओ का राॅ-मटीरिअल बन चुकी है। भाजपा ने जिस तरह अपने मेनिफेस्तो में राममंदिर और गाय का जिक्र किया वह यही मान रही है कि नब्बे के दौर में जिस रामकार्ड ने सत्ता तक पहंुचाया वह आज भी सत्ता पाने का सबसे धारदार हथियार है इसलिए संयम से ही सही अपने मेनिफेस्तो में राम लिखना नहीं भूली ताकि हिन्दू वोट पोलोराइज हो सकें।
दरअसल मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जो हालात राजनेताओ द्वारा  पैदा किये गए उसने उत्तरप्रदेश में हिन्दू और मुसलमानो में असुरक्षा का भाव पैदा कर दिया है और वह यह मानने लगा है कि पहली बार गवर्नेंस से बड़ा मुद्दा उस सरकार को चुनने का हो गया है, जो उनकी हितैसी हो। जिस सरकार के शासन तले हिन्दू, मुसलमानो को न धमका सके और मुसलमान हिन्दुओ को. मुसलमान 2002 में गुजरात में हुए दंगो के बाद मोदी को खलनायक मानने लगे है इसलिए वह भाजपा को टक्कर दे रहे किसी भी पार्टी के उम्मीदवार का साथ दे सकता है।