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शनिवार, 26 जुलाई 2014

298 यात्रियों सहित मलबे में तब्दील हुआ मलेशियाई विमान

नीदरलैंड्स की राजधानी एम्स्टर्डम से कुआलालम्पुर जा रहे मलेशियाई विमान बोइंग 777 को यूक्रेन के अलगाववादियों ने मार गिराया, इस घटना की सयुक्तराष्ट्र और अमेरिका ने कड़ी निंदा की है। कहा जा रहा है कि यूक्रेन के इन सेपेरिस्टों को रूस लगातार मदद करता आया है।  इसलिए इस घटना के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने रूस को जिम्मेदार ठहराया। मलेशियाई विमान को जिस बक मिशाइल से गिराया गया वह हवा में कई हज़ार किलोमीटर तक मार कर सकने वाली मिशाइल  बताई जा रही है।  तो सवाल यही उठ रहा है की आखिर विद्रोहियों के पास यह मिशाइल आई कहाँ से, क्योंकि इस तरह के हथियार तो रूसी ही बनाता है।  दरअसल कुछ समय पहले चीन ने अपनी विस्तार वादी नीति के तहत यूक्रेन में कुछ जगह ली है जिसको की रूस सही नहीं मान रहा है।  इसलिए वह यूक्रेन के क्रीमिया स्थित विद्रोहियों को लगातार समर्थ देता आया है। आगे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में इस घटना को लेकर क्या होगा? क्या क्रेमियां में रूसी समर्थित विद्रोहियों पर प्रतिबन्ध लगेगा देखना होगा।     

मार गिराये गए मलेशियाई विमान का मलबा 

 

उत्तराखंड उपचुनाव में भाजपा की हार मोदी के लिए चेतावनी

(दैनिक जनवाणी उत्तराखंड से साभार )
खोखले मंसूबों में पंख नहीं लगते। लुभावनी घोषणाओं के नखलिस्तान में उम्मीदों की बारिश नहीं होती। उत्तराखंड में विधानसभा  की तीन सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया है कि लुभावने सब्जबाग की उम्र लम्बी नहीं होती है। लोकसभा चुनाव से पूर्व भाजपा ने जितने भी  दावे किए और जो भी घोषणाएं की वह अभी तक घोषणाओं से आगे नहीं बढ़ पाई है। कई मामलों में तो मोदी सरकार समस्याओ के सामने दंडवत नजर आई। महंगाई भगाओ नाम की जिस नाव पर सवार होकर भाजपा ने चुनावी समंदर को पार किया उसी नाव में मोदी सरकार ने सत्तर छेद कर दिए।

 नतीजा सामने है। केन्द्र में मोदी की सरकार बनने के बाद देश में पहली बार विधानसभा  के तीन सीटों पर उपचुनाव हुए। भाजपा-कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर हुई और देवभूमि उत्तराखंड की सरजमीं इसका गवाह बनी। इसके बावजूद कि गत लोकसभा  चुनाव में इन सीटों पर भाजपा ने उल्लेखनीय बढ़त बनाई थी, महज ढाई महीने के बाद विस चुनाव हुए तो बीजेपी का पत्ता साफ हो गया। दरअसल यह सब उस राज्य में हुआ है जहां भाजपा खुद को ज्यादा सहज महसूस करती है। एनडीए के शासनकाल में ही उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ था। यहां पहली निर्वाचित सरकार भी  भाजपा की ही बनी थी। उसी उत्तराखंड के मतदाताओं ने भाजपा को खारिज कर दिया। ये नतीजे भाजपा के लिए संदेश भी  है और सबक भी । वह किसी भ्रम में ना रहे। उत्तराखंड के चुनावी नतीजे ने साफ कर दिया है कि सिर्फ मोदी लहर पर सवार होकर चुनाव नहीं जीते जा सकते। इस छोटे से प्रदेश ने भाजपा को एक बड़ा संदेश दिया है। भाजपा को समझना होगा कि राज्यों की जरूरतें, वहां के वाशिंदों की अपेक्षाएं और उम्मीदें अलग होती है।यह बात शीशे की तरह साफ हो गयी है कि सिर्फ नमो-नमो के सहारे जनता के दिलों पर राज नहीं किया जा सकता। यदि भाजपा को मोदी लहर पर सवार होकर ही राजनीति करनी है ऐसे में भाजपा को न केवल हाल में होने वाले विधानसभा  के चुनावों के लिए ठोस रणनीति बनानी होगी बल्कि  इस बात का प्रयास भी करना होगा कि लोस चुनाव से पूर्व किए गए वायदों को पूरा किया जाए। आगामी कुछ महीनों में बिहार समेत कई प्रदेशों में विधानसभा  का चुनाव प्रस्तावित है। ये वो राज्य हैं जहां भाजपा की सरकार नहीं है। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और गोवा की विधानसभा का आधा कार्यकाल बीत चुका है। यानी दो साल बाद इन राज्यों में भी चुनावी बिगुल बजना है। भाजपा को यदि इन तमाम राज्यों में जीत दर्ज करानी है तो उसे अपनी रणनीति बदलनी होगी। सब्जबाग दिखाकर जनता को लुभाने का वक्त अब भाजपा के लिए खत्म हो चुका है। उसे अब जमीन से जुड़ना होगा और जनता तक पहुंचना होगा। वह भी आश्वासनों के साथ नहीं बल्कि विकास की सुहानी तस्वीरों के साथ। पुरानी कहावत है, काम होने से ज्यादा आवश्यक है कि लोगों को यह महसूस हो कि काम हो रहा है। भाजपा ने जो दावे किए और जो वायदे किए उन्हें लेकर एक पल के लिए भी  नहीं लगा है कि उन वायदों पर अमल हो रहा है या भाजपा की ऐसी मंशा है। भाजपा की रणनीति से ऐसा आभास हो रहा है कि वह सिर्फ कांग्रेस को कोसकर सत्ता का सुख भोगना चाहती है। इससे काम नहीं चलेगा।
भाजपा चाहे तो हरीश रावत से यह सबक सीख सकती है। वह चाहे सीएम का सरकारी आवास छोड़कर बीजापुर गेस्ट हाउस में रहने का फैसला हो या फिर शपथ ग्रहण के तत्काल बाद आपदा प्रभावित क्षेत्रों का मैराथन भ्रमण हो।
हरीश रावत ने साबित किया कि पहाड़ और पहाड़ के वाशिंदों का दर्द उनका अपना दर्द है। गर्दन की चोट के कारण एम्स में भर्ती हरीश रावत अपना नामांकन करने तक के लिए प्रदेश में नहीं आए। यहां तक कि उन्होंने एक दिन भी  चुनाव प्रचार में भाग नहीं लिया। अलबत्ता जब उन्हें पता चला कि पहाड़ों पर लगातार बारिश हो रही है और सूबे में पिछले साल जैसे हालात पैदा हो रहे हैं तो वह अपनी बीमारी को भूलकर सीधे देहरादून दौड़े चले आए। हरीश के इस फैसले के पीछे उनकी सियासी रणनीति जो भी  रही हो, जनता ने यही समझा कि यह आदमी उनके बीच का है। इस हार में भाजपा के लिए भी संदेश है। संदेश यह है कि बिना मजबूत नेतृत्व के चुनावी रण में जनता के बीच ठहरना मुश्किल है। जीत हासिल करने के लिए मजबूत नेतृत्व बेहद जरूरी है। नरेन्द्र मोदी में संभावना दिखी तो जनता ने उन्हें हाथों हाथ लिया। भाजपा को यदि लम्बे समय तक खुद को राजनीति में स्थापित रखना है तो राज्यों में उसे अपना मजबूत नेतृत्व तैयार करना होगा।

बुधवार, 9 अप्रैल 2014

गवर्नेंस या मुसलमान बनाम हिन्दू

देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तरप्रदेश लोकसभा की 80 सीटें, हर कोई जानता है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही होकर जाता है। दरअसल 2014  के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश पर हर कोई सिर्फ इसलिए भी टकटकी लगाए नहीं बैठा है क्योंकि, इस चुनाव में नायक तौर पर पेश किये जा रहे मोदी और केजरीवाल, उत्तर प्रदेश की ही जमीन से टकरा रहे हैं बल्कि इसलिए भी क्योंकि उत्तरप्रदेश की पूरी लड़ाई हिन्दू बनाम मुसलमान हो चुकी है और अब इस टकराव का ऐलान मुजफरनगर दंगो के परिणाम स्वरुप खुले  तौर पर किया जा रहा है। देवबंद में जमीयत उलेमा-ए-हिंद के मुखिया मोहम्मद अरशद मदनी जिस बात का जिक्र कर गए कि भाजपा अगर सत्ता में आ गयी तो देश को बांट देगी इसलिए भाजपा को हराने के लिए गोलबंद हो जाओ।

सपा, बसपा, कांग्रेस को आगे बढ़ाओ लेकिन भाजपा और मोदी को रोको। उसका एक मतलब यह भी निकलता है कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम भाजपा के खिलाफ एकजुट हैं तो अन्य पार्टियों के हिन्दू वोटरों का धु्रवीकरण भी भाजपा में जमकर होगा। क्योंकि जब जब माइनाॅरिटी और मज्यूरिटी को बांटा गया है फायदा बहुसंख्यकों का ही हुआ है 2002 के बाद गुजरात इसका उदाहरण मान सकते हैं। इन सबके बावजूद उत्तरप्रदेश में अगर हिन्दू मुस्लिम समीकरण खुलकर सामने आते हैं तो जातीय समीकरण टूटेंगे अर्थात दलित, जाट. इत्यादि वोट भाजपा के ही मिलेंगे और भाजपा को उदितराज के जरिये भी दलित वोट मिल सकते है। इसका सीधा मतलब होगा भाजपा की जीत, लेकिन बनारस में जिस तरह मुरली मनोहर जोशी को हटाकर मोदी को लाया गया और लखनऊ में राजनाथ को, उससे भाजपा को पंडित वोटो के कटने का डर जरूर सता रहा होगा। बनारस में हिन्दू और मुसलमान वोटर बराबर हैं। कांग्रेस ने यहाँ कोई मजबूत उम्मीदवार खड़ा नहीं किया और यह भी कहा जा रहा है कि पिछली बार बसपा के टिकट पर चुनाव लडे़ मुख्तार अंसारी को इस बार यह कह कर मुसलमानो द्वारा किनारे किया जा रहा है कि सारे मुसलमान वोट मोदी को रोकने के लिए केजरीवाल के पक्ष में कर दिए जाएँ, और अगर ऐसा हुआ तो बनारस में मुकाबला दिलचस्प हो जाएगा।
 दरअसल जिस तरह मुस्लिम धर्म गुरुओ खासतौर पर जामा मस्जिद इमाम बुखारी साहब द्वारा भाजपा को रोकने का ऐलान खुले तौर पर किया जा रहा है और अमित शाह भी जो भाषा बोल गए, संकेत यही है कि हिन्दू, मुसलमान की आर-पार की लड़ाई उत्तर प्रदेश के चुनाओ का राॅ-मटीरिअल बन चुकी है। भाजपा ने जिस तरह अपने मेनिफेस्तो में राममंदिर और गाय का जिक्र किया वह यही मान रही है कि नब्बे के दौर में जिस रामकार्ड ने सत्ता तक पहंुचाया वह आज भी सत्ता पाने का सबसे धारदार हथियार है इसलिए संयम से ही सही अपने मेनिफेस्तो में राम लिखना नहीं भूली ताकि हिन्दू वोट पोलोराइज हो सकें।
दरअसल मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जो हालात राजनेताओ द्वारा  पैदा किये गए उसने उत्तरप्रदेश में हिन्दू और मुसलमानो में असुरक्षा का भाव पैदा कर दिया है और वह यह मानने लगा है कि पहली बार गवर्नेंस से बड़ा मुद्दा उस सरकार को चुनने का हो गया है, जो उनकी हितैसी हो। जिस सरकार के शासन तले हिन्दू, मुसलमानो को न धमका सके और मुसलमान हिन्दुओ को. मुसलमान 2002 में गुजरात में हुए दंगो के बाद मोदी को खलनायक मानने लगे है इसलिए वह भाजपा को टक्कर दे रहे किसी भी पार्टी के उम्मीदवार का साथ दे सकता है।   

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

क्या सचमुच सेक्युलर हो चुकी है भाजपा ?

मुक्तिबोध कहते थे पार्टनर आपकी पॉलिटिक्स क्या है ? वाकई पॉलिटिक्स में कब क्या हो जाए कोई कह नहीं सकता दरअसल भाजपा 2014 के मध्यनजर वह कर रही जो न उसकी विचारधारा से मेल खाता है और न ही जिसका पाठ उसे कभी संघ ने पढाया, दरअसल भाजपा डी कार्ड और एम कार्ड के आसरे 2014 फतह करने के फुल मूड़ में है। अपने डी कार्ड की बिसात भाजपा यूपी और बिहार में वहां के दलित नेता रामविलास पासवान और उदित राज के आसरे बिछाने की तैयारी कर चुकी है।

 बिहार में 23 फीसदी और यूपी में 22 फीसदी दलित वोट हैं जो कि दलितों के ही पक्ष ही पडते हैं, और यूपी, बिहार में ऐसा कोई दलित चेहरा भाजपा के पास है नहीं जो सीट दिल सके, इसलिए  अगर किसी तरह भाजपा इन वोटों में सेंध लगाने में कामयाब होती है तो उसे यूपी, बिहार की 120 सीटों पर भारी लाभ होगा। याद करें तो आज से ठीक 12 बरस पहले 27 फरवरी 2002 को गुजरात के गोधरा में दंगों की आग भडकी थी. और उसके बाद ही एनडीए के गठबंधन से लोजपा के रामविलास पासवान इस गठबंधन से इसलिए चलते बने क्योंकि भाजपा पर लगातार साम्प्रदायिकता के आरोप लग रहे थे. लेकिन सत्ता से दूर रहने की गलती शायद पासवान के समझ में आ गयी इसलिए अब 2014 के मध्यनजर भाजपा के पक्ष में हवा बहती देख वापस आने की सोच रहे है। सत्ता के सुख पाने के लालच में राजनीतिक पार्टियों की विचारधारा लगातार हाशिये पर आ रही हैं. याद करें तो वी.पी सिंह ने जब दलितों के लिए आरक्षण की बात की तो मंडल आयोग का विरोध करने में सबसे पहले आरएसएस और भाजपा ही थे। ये ही नहीं जब 90 के दौर में आडवाणी देशभर में रथयात्रा कर रहे थे तो पासवान विरोध करने वालों में सबसे पहले थे। अर्थात  संघ और अम्बेडकरवादी सोच ने कभी एक दुसरे से समानता नहीं रखी. लेकिन इन सबके विपरीत 2014 के सत्ता के खेल में ऐसे ही कुछ ऐसे कारनामे हो रहे है जिसके बारे में न कभी बीजेपी ने सोचा और न ही कभी संघ ने. क्योंकि संघ के ही स्वयंसेवक मोदी पहली बार संघ की सोच के इतर ऐसा ही रास्ता अपना रहे है जहाँ विचारधारा गायब है और भाजपा सेक्यूलर रंग में रंगकर 2014 में सत्ता पाने के लिए ऐसा कुछ भी करने करने पर आमादा दिख रही है जो कभी भाजपा के ऐतिहासिक विचारधारा में रहा ही नहीं।
वही भाजपा एम कार्ड यानी मुस्लिम वोट को भी हाथ से नही जाने देना चाहती है। इसलिए भाजपा लगातार खुद सेक्यूलर दिखना चाह रही है। अब राजनाथ सिंह ने भी मुस्लिमों से माफी मागने की बात की है और राम मंदिर का मुद्दा लगातार धुधला होता जा रहा है, जिसके आसरे उसने 1998 में सत्ता का स्वाद चखा था। संघ के स्वयं सेवकों से बनी भाजपा संघ के पढाये पाठ से इतर नई कहानी लिख रही है और संघ भी हवा के रूख को देखकर चुप रहने में भलाई समझ रहा है, लेकिन सवाल यह भी है कि अगर भाजपा संघ से अलग विचारधारा की बात करती है तो बाबरी मस्जिद को तोड़कर मंदिर बनाने की बात कैसे कर सकती है, तो क्या अब भाजपा को अपनी गलती का एहसास हो चुका है? और वह सचमुच सेक्युलर हो चुकी है।      

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

अल्पसंख्यक वोट के आसरे 2014

  यह तो तय है की 2014 के लोकसभा चुनाव भी राजनीतिक पार्टियां जातीय समीकरणों के आधार पर लड़ने जा रही हैं। पार्टियां जातीय आधार पर हिन्दू और मुसलमानों में धु्रवीकरण की राजनीति के नायाब फॉर्मूले अपना रही हैं। इंटेलीजेंस ब्यूरो की एक रिपोर्ट के अनुसार  देश में हिन्दु, मुस्लिम समुदाय में यह धु्रवीकरण एक अंडर-करंट के रूप में फैल रहा है।

 उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्य में यह सबसे तेजी से फैल रहा है और मीडिया सर्वे इसका संकेत भी दे रहे हैं। पिछले कुछ दिनों में कई ऐसी घटनाएं हुई हैं या प्रायोजित की गई हैं जिससे माइनॉरिटी या मेज्योरिटी के आधार पर लोगों में 2014 के मध्यनजर जनमत तैयार किया जा सके। इस बात में कोई दो राय नहीं कि जब-जब देश के भीतर जातीय हिंसा हुई तब-तब माइनॉरिटी और मज्योरिटी के आधार पर सत्ता का निर्धारण हुआ है। तब चाहे बात 1984  के बाद की सत्ता हो या 2002 के बाद मोदी का गुजरात में फिर से सत्ता पाने की हो। देश के एक बड़े और अहम् राज्य यूपी के मेरठ में हिन्दुत्व की पाठशाला नरेंनद्र मोदी की रैली के दौरान पहली बार जैसी भीड़ दिखी वह कहीं न कहीं यह संकेत भी हैं कि यूपी में मुज्जफरनगर दंगों के बाद जातीय धु्रवीकरण की बात को खारिज नहीं किया जा सकता है। टीवी चैनल टाइम्स नाउ में राहुल गांधी के 1984 के दंगो को लेकर माफी न मांगने वाली बात को मीडिया ने जिस गैर जिम्मेदार तरीके से उठाया और भाजपा ने उसे जिस गति से लपका उसने चुनाव से पहले देश में गवर्नेंस के मुद्दों से इतर जातीय विभाजन के आधार पर वोटबैंक का माहौल बना दिया। दूसरी तरफ देश की नयी पार्टी आम आदमी पार्टी ने 2014 के चुनावो से ठीक पहले जिस तरह 1984 के दंगो की जांच एसआईटी से करवाने की बात करके जोरदार सियासी चाल चली है उससे पार्टी को जातीय आधार पर लाभ मिलना तय है जबकि अपने तरकस में यह तीर गवर्नेंस के मुद्दों की बात करने वाली आम आदमी पार्टी दिल्ली चुनाव से पहले ही रख चुकी थी, जिसका उसे लाभ दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिला भी। बात अगर मुस्लिम अलपसंख्यक समाज की करें तो देश की 200 से अधिक लोकसभा सीटों का फैसला मुस्लिम वोट तय करते हैं। राजेंदर सच्चर रिपोर्ट में जो मुसलमानो की स्थिति दिखाई गई है उसका एक नायाब सच यह भी है कि नेहरू से लेकर मनमोहन के दौर तक मुसलमानो के लिए 210,00 से भी ज्यादा कल्याणकारी  योजनाएं लायी जा चुकी हैं लेकिन इन योजनाओ की हकीकत कागजों  तक ही सीमित रही, ताकि हर चुनाव से पहले राजनीतिक पार्टियों के लिये अल्पसंख्यक समुदाय चुनाव जीतने का रॉ -मटीरियल बना रहे और कांग्रेस, भाजपा इस बात को हर चुनाव में दोहराती रहे कि अल्पसंख्यक समाज हासिये पर पड़ा हुआ है, और सच है भी यही। तो हकीकत यही मान लिया जाए कि अल्पसंख्यक समुदाय राजनीति में सिर्फ एक वोटबैंक है और इनके इम्पावर की बात हर राजनीतिक दल हर बार इसलिए करना चाहता है ताकि आने वाले हर चुनाव में अल्पसंख्यक शब्द वोट खींचने का जरिया बना रहे।  

गुरुवार, 23 जनवरी 2014

जब सरकार ही धरने पर बैठ जाए तो....

भारतीय लोकतंत्र में संविधान लागू हुए 60 बरस से ज्यादा का वक़्त हो चला है, लेकिन किसी लोकतान्त्रिक देश में इससे बड़ी त्रासदी क्या सकती है जहाँ जनता को सरकार तक अपनी बात कहने के लिए आंदोलनो और धरनो का सहारा लेना पड़े और जब मुख्यमंत्री और उनकी सरकार ही धरने पर बैठ जाये तो आम आदमी की आवाज इस देश के भीतर कहाँ तक पहुचती है इसका अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है.  क्योंकि जब संविधान की शपथ लेकर बनी सरकार और उसके मंत्री ही जब संवैधानिक व्यवस्था को चुनौती दे दें. और समस्या के समाधान के लिए संविधान में लिखे तौर तरीकों से इतर चलकर आंदोलन और धरनो का रास्ता चुने तब क्या यह मान लिया जाये की लोकतंत्र में संविधान का मतलब कुछ भी नहीं और धरने, आंदोलन आज की राजनैतिक व्यवस्था की जरूरत.
 क्योंकि जिस तरह से आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी ने सड़क पर आंदोलन कर दिल्ली की सत्ता हासिल की और धारा 144  को ताक पर रखकर पुलिस अफसरों  को हटाने को लेकर सड़क पर जमकर हंगामा काटा. उससे खुलेतौर पर जो संकेत मिले वो यह कि सरकार के प्रति वर्त्तमान परिस्थितियों को लेकर जनता में जो गुस्सा है उसको आंदोलन का रूप देकर राजनैतिक लाभ प्राप्त किया जा रहा है. क्योंकि 2014  के आम चुनाव के मध्यनजर दिल्ली से ही सियासी पैंतरेबाजी शुरू हो चुकी है. पहले दिल्ली की ही नयी -नवेली सरकार की बात करें तो  दिल्ली के क़ानून मंत्री सोमनाथ भारती सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को अनदेखा कर पुलिसिया अंदाज़ में उतर गए और फिर पुलिस अफसरों को हटाने की मांग को लेकर सड़क पर आंदोलन कर डाला, साथ ही इन सबके बावजूद ऐसी कौन सी परिस्थितियां है जिनसे डरकर केजरीवाल सरकार हर काम को शॉर्टकट में निपटा देना चाहती है क्योंकि सरकार का कार्यकाल तो 5  साल होता है . भले ही केजरीवाल के इन तौर तरीकों को कितना ही असंवैधानिक क्यों न माना जाए इस सबके इतर एक सच यह भी है कि इन सब मे जनता केजरीवाल के निकट आ रही है. इसका कारण है  कई सालों के जनसरोकार से दूर जाती राजनैतिक व्यवस्था. भले ही केजरीवाल के ये  राजनैतिक तौर तरीके राजनैतिक हानि लाभ के लिए हो लेकिन इससे जनता में उनके प्रति आकर्षण बढ़ रहा है. यानि ये तौर तरीके जनता को भा रहे है. और वह इसलिए कि कई सालों से भाजपा, कांग्रेस जिस तरह जनता को ठगा है और क्रोनी कैपिटलिज्म इस देश के भीतर शुरू हुआ उससे जनता में राजनीति के प्रति एक घृणा का भाव आ गया था, और अब उसके सामने आप पार्टी एक विकल्प के तौर पर दिखायी दे रहा है, ये विकल्प कितना सही होगा आने वाला वक़्त बतायेगा, क्योंकि अब तक जो किया जनता ने किया सरकार बदल कर अब जो करना है वो केजरीवाल को.
 . भारतीय संविधान के तहत आम नागरिकों के जो अधिकार हैं वह उन्ही लो पाने के लिए जद्दोजहद कर रहा है, तो क्या संविधान लागू होने के 60 बरस बाद भी हम वही खड़े हैं जहाँ 60 बरस पहले थे, हमारी आज़ादी में आंदोलनो का बड़ा योगदान रहा लेकिन तब आंदोलन अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ था, लेकिन आज के दौर में आंदोलनो और धरनो का मतलब क्या यह  निकाला  जाए कि संविधान आज भी लागू नहीं हो पाया, जनता की चुनी सरकार जनता की नहीं सुनती. तो फिर लोकतंत्र का मतलब क्या है ?   जब संविधान के तहत हर समस्या के समाधान का एक संवेधानिक रास्ता है तो आज के दौर में धरनो का मतलब क्या निकाल जाए ? या जिस तरह अन्ना के आंदोलन से निकली आप पार्टी ने आंदोलन करके दिल्ली की गद्दी पा ली उसका मतलब धरना आंदोलन सिर्फ राजनैतिक लाभ-हानि के लिए है. देखते जाइये 65 साल के इस गणतंत्र में वर्त्तमान राजनीति गणतांत्रिक व्यवस्था को चुनौती दे रही है, 

रविवार, 22 दिसंबर 2013

बिछने लगी है 2014 की विसात

45 बरस से कोई भी सरकार जिस क़ानून को बनाने की हिम्मत नहीं जुटा पायी, जिस क़ानून को बनाने लिए के सड़कों पर बड़े- बड़े आंदोलन हुए, आखिर वह लोकपाल क़ानून बिना किसी रुकावट के संसद में पास हो गया,क्या यह चमत्कार था या यह मान लिया जाए कि एक लोकतंत्र की राजनीति सुधर रही है,पारदर्शिता आ रही है,  या यह मान लिया जाए कि पार्टियां आने वाले आम चुनाओ के लिए सियासी विसात बिछा रही हैं ,क्योंकि पहली बार कोई पार्टी हर फैसला जनता की राय लेकर करना चाहती है और सरकार बनाएं कि नहीं यह जानने के लिए जनता के बीच जाकर सभाएं कर रही हैं, वहीँ दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी उसी पार्टी को समर्थन देने के लिए आमादा है जो उसे विलेन बनाकर चुनाव जीती है, लेकिन आम आदमी पार्टी की परेशानी यह है कि उसे सरकार बनाने से ज्यादा चिंता अपने आत्मसमान और साख की है, क्योंकि उसने जनता से वादा किया था कि वह भ्रष्टाचारियों से किसी भी हालत में दोस्ती नहीं करेंगे,

 सरकार बनाने के किये जोड़-तोड़ के तिकड़म करने में माहिर भाजपा भी सत्ता से दूर ही रहना चाहती है,आखिर क्यों ? जबकि भारत की राजनाति के पन्नो को पलटें तो यही मिलेगा कि चुनाव जीतने के बाद चुनावी वादे तो दूर की बात है पार्टियों ने जनता के बीच आना भी उचित नहीं समझा, तो क्या मौजूदा हालात देश के राजनीतिक तौरतरीकों में बदलाव का इशारा कर रही है, जब हर कोई पार्टी सत्ता पाने के लालच से इतर जनता में अपनी साख और भरोसा जगाना चाहती है, क्योंकि दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाओ में जिस तरह जनता ने भाजपा कांग्रेस को खारिज कर एक नयी पार्टी को जिताकर यह संकेत दिया कि वो बदलाव चाहती है, कहीं जनता के इस मेसेज से पारम्परिक पार्टियां डर और सहम तो नहीं गयी हैं, इसलिए 2014 में आने वाले आम चुनाओ के लिए कोई गलती नहीं करना चाहती हैं,
इस सच्चाई को किसी भी तरह ख़ारिज नहीं किया जा सकता कि आम आदमी पार्टी ने दिल्ली चुनाओ में जिस ट्रांस्परेंसी से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की उसने अन्य पार्टियों को भी इसी राह पार चलने को मजबूर कर दिया है कि अगर आम आदमी को नजरअंदाज करोगे तो सत्ता बदल दी जायेगी, देश की राजनीति में बदलाव की यह शुरुआत तो आम आदमी पार्टी ने शुरू की है, भले ही वह अपने चुनावी वायदों पर खरी उतरे या नहीं ,
दिल्ली विधान सभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने शायद यह सोचा भी नहीं होगा कि इतनी बड़ी जीत मिल जायेगी इसलिए उसने ऐसा एजेंडा बनाया जिससे आम आदमी में भरोसा जगे, उसने आधारभूत समस्याओ को ही आधार बनाया और वादा किया कि वह लोगों को बिजली पानी सस्ते दामों पर दिलवाएगी, पार्टी की ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि देखकर लोगों ने भरोसा किया और बड़ी जीत दिलवायी, अब जनता और विपक्षी पार्टिया दबाव बना रही हैं कि सरकार बनाओ और वादे पूरे करो, वादे भले ही मुश्किल हो लेकिन आम आदमी पार्टी 2014 के चुनावो में उतरने का पूरा मन बना चुकी है, इसलिए आम आदमी को समर्थन देने का कोंग्रेसी दांव उसे भारी भी पड़ सकता है, क्योंकि आम आदमी पार्टी 2014 को लेकर सारे देश में अपना नेटवर्क बना चुकी है कई राज्यों यूपी उत्तराखंड में अपने दफ्तर भी खोल चुकी है, और अगर आम आदमी पार्टी को 2014 के चुनाओ से पहले कुछ महीने सरकार बनाने का मौका मिलता है तो वह अपने किये वादों को पूरा करने की कोशिश करेगी, जिससे जनता में एक सकारात्मक सन्देश जाए भले ही इन वादों कि भरपाई का असर कैसा भी हो, अगर आम आदमी पार्टी यह काम कर गयी तो 2014 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस और भाजपा के लिए किसी खतरे से कम नहीं होगा,