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शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

अल्पसंख्यक वोट के आसरे 2014

  यह तो तय है की 2014 के लोकसभा चुनाव भी राजनीतिक पार्टियां जातीय समीकरणों के आधार पर लड़ने जा रही हैं। पार्टियां जातीय आधार पर हिन्दू और मुसलमानों में धु्रवीकरण की राजनीति के नायाब फॉर्मूले अपना रही हैं। इंटेलीजेंस ब्यूरो की एक रिपोर्ट के अनुसार  देश में हिन्दु, मुस्लिम समुदाय में यह धु्रवीकरण एक अंडर-करंट के रूप में फैल रहा है।

 उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्य में यह सबसे तेजी से फैल रहा है और मीडिया सर्वे इसका संकेत भी दे रहे हैं। पिछले कुछ दिनों में कई ऐसी घटनाएं हुई हैं या प्रायोजित की गई हैं जिससे माइनॉरिटी या मेज्योरिटी के आधार पर लोगों में 2014 के मध्यनजर जनमत तैयार किया जा सके। इस बात में कोई दो राय नहीं कि जब-जब देश के भीतर जातीय हिंसा हुई तब-तब माइनॉरिटी और मज्योरिटी के आधार पर सत्ता का निर्धारण हुआ है। तब चाहे बात 1984  के बाद की सत्ता हो या 2002 के बाद मोदी का गुजरात में फिर से सत्ता पाने की हो। देश के एक बड़े और अहम् राज्य यूपी के मेरठ में हिन्दुत्व की पाठशाला नरेंनद्र मोदी की रैली के दौरान पहली बार जैसी भीड़ दिखी वह कहीं न कहीं यह संकेत भी हैं कि यूपी में मुज्जफरनगर दंगों के बाद जातीय धु्रवीकरण की बात को खारिज नहीं किया जा सकता है। टीवी चैनल टाइम्स नाउ में राहुल गांधी के 1984 के दंगो को लेकर माफी न मांगने वाली बात को मीडिया ने जिस गैर जिम्मेदार तरीके से उठाया और भाजपा ने उसे जिस गति से लपका उसने चुनाव से पहले देश में गवर्नेंस के मुद्दों से इतर जातीय विभाजन के आधार पर वोटबैंक का माहौल बना दिया। दूसरी तरफ देश की नयी पार्टी आम आदमी पार्टी ने 2014 के चुनावो से ठीक पहले जिस तरह 1984 के दंगो की जांच एसआईटी से करवाने की बात करके जोरदार सियासी चाल चली है उससे पार्टी को जातीय आधार पर लाभ मिलना तय है जबकि अपने तरकस में यह तीर गवर्नेंस के मुद्दों की बात करने वाली आम आदमी पार्टी दिल्ली चुनाव से पहले ही रख चुकी थी, जिसका उसे लाभ दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिला भी। बात अगर मुस्लिम अलपसंख्यक समाज की करें तो देश की 200 से अधिक लोकसभा सीटों का फैसला मुस्लिम वोट तय करते हैं। राजेंदर सच्चर रिपोर्ट में जो मुसलमानो की स्थिति दिखाई गई है उसका एक नायाब सच यह भी है कि नेहरू से लेकर मनमोहन के दौर तक मुसलमानो के लिए 210,00 से भी ज्यादा कल्याणकारी  योजनाएं लायी जा चुकी हैं लेकिन इन योजनाओ की हकीकत कागजों  तक ही सीमित रही, ताकि हर चुनाव से पहले राजनीतिक पार्टियों के लिये अल्पसंख्यक समुदाय चुनाव जीतने का रॉ -मटीरियल बना रहे और कांग्रेस, भाजपा इस बात को हर चुनाव में दोहराती रहे कि अल्पसंख्यक समाज हासिये पर पड़ा हुआ है, और सच है भी यही। तो हकीकत यही मान लिया जाए कि अल्पसंख्यक समुदाय राजनीति में सिर्फ एक वोटबैंक है और इनके इम्पावर की बात हर राजनीतिक दल हर बार इसलिए करना चाहता है ताकि आने वाले हर चुनाव में अल्पसंख्यक शब्द वोट खींचने का जरिया बना रहे।  

गुरुवार, 23 जनवरी 2014

जब सरकार ही धरने पर बैठ जाए तो....

भारतीय लोकतंत्र में संविधान लागू हुए 60 बरस से ज्यादा का वक़्त हो चला है, लेकिन किसी लोकतान्त्रिक देश में इससे बड़ी त्रासदी क्या सकती है जहाँ जनता को सरकार तक अपनी बात कहने के लिए आंदोलनो और धरनो का सहारा लेना पड़े और जब मुख्यमंत्री और उनकी सरकार ही धरने पर बैठ जाये तो आम आदमी की आवाज इस देश के भीतर कहाँ तक पहुचती है इसका अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है.  क्योंकि जब संविधान की शपथ लेकर बनी सरकार और उसके मंत्री ही जब संवैधानिक व्यवस्था को चुनौती दे दें. और समस्या के समाधान के लिए संविधान में लिखे तौर तरीकों से इतर चलकर आंदोलन और धरनो का रास्ता चुने तब क्या यह मान लिया जाये की लोकतंत्र में संविधान का मतलब कुछ भी नहीं और धरने, आंदोलन आज की राजनैतिक व्यवस्था की जरूरत.
 क्योंकि जिस तरह से आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी ने सड़क पर आंदोलन कर दिल्ली की सत्ता हासिल की और धारा 144  को ताक पर रखकर पुलिस अफसरों  को हटाने को लेकर सड़क पर जमकर हंगामा काटा. उससे खुलेतौर पर जो संकेत मिले वो यह कि सरकार के प्रति वर्त्तमान परिस्थितियों को लेकर जनता में जो गुस्सा है उसको आंदोलन का रूप देकर राजनैतिक लाभ प्राप्त किया जा रहा है. क्योंकि 2014  के आम चुनाव के मध्यनजर दिल्ली से ही सियासी पैंतरेबाजी शुरू हो चुकी है. पहले दिल्ली की ही नयी -नवेली सरकार की बात करें तो  दिल्ली के क़ानून मंत्री सोमनाथ भारती सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को अनदेखा कर पुलिसिया अंदाज़ में उतर गए और फिर पुलिस अफसरों को हटाने की मांग को लेकर सड़क पर आंदोलन कर डाला, साथ ही इन सबके बावजूद ऐसी कौन सी परिस्थितियां है जिनसे डरकर केजरीवाल सरकार हर काम को शॉर्टकट में निपटा देना चाहती है क्योंकि सरकार का कार्यकाल तो 5  साल होता है . भले ही केजरीवाल के इन तौर तरीकों को कितना ही असंवैधानिक क्यों न माना जाए इस सबके इतर एक सच यह भी है कि इन सब मे जनता केजरीवाल के निकट आ रही है. इसका कारण है  कई सालों के जनसरोकार से दूर जाती राजनैतिक व्यवस्था. भले ही केजरीवाल के ये  राजनैतिक तौर तरीके राजनैतिक हानि लाभ के लिए हो लेकिन इससे जनता में उनके प्रति आकर्षण बढ़ रहा है. यानि ये तौर तरीके जनता को भा रहे है. और वह इसलिए कि कई सालों से भाजपा, कांग्रेस जिस तरह जनता को ठगा है और क्रोनी कैपिटलिज्म इस देश के भीतर शुरू हुआ उससे जनता में राजनीति के प्रति एक घृणा का भाव आ गया था, और अब उसके सामने आप पार्टी एक विकल्प के तौर पर दिखायी दे रहा है, ये विकल्प कितना सही होगा आने वाला वक़्त बतायेगा, क्योंकि अब तक जो किया जनता ने किया सरकार बदल कर अब जो करना है वो केजरीवाल को.
 . भारतीय संविधान के तहत आम नागरिकों के जो अधिकार हैं वह उन्ही लो पाने के लिए जद्दोजहद कर रहा है, तो क्या संविधान लागू होने के 60 बरस बाद भी हम वही खड़े हैं जहाँ 60 बरस पहले थे, हमारी आज़ादी में आंदोलनो का बड़ा योगदान रहा लेकिन तब आंदोलन अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ था, लेकिन आज के दौर में आंदोलनो और धरनो का मतलब क्या यह  निकाला  जाए कि संविधान आज भी लागू नहीं हो पाया, जनता की चुनी सरकार जनता की नहीं सुनती. तो फिर लोकतंत्र का मतलब क्या है ?   जब संविधान के तहत हर समस्या के समाधान का एक संवेधानिक रास्ता है तो आज के दौर में धरनो का मतलब क्या निकाल जाए ? या जिस तरह अन्ना के आंदोलन से निकली आप पार्टी ने आंदोलन करके दिल्ली की गद्दी पा ली उसका मतलब धरना आंदोलन सिर्फ राजनैतिक लाभ-हानि के लिए है. देखते जाइये 65 साल के इस गणतंत्र में वर्त्तमान राजनीति गणतांत्रिक व्यवस्था को चुनौती दे रही है, 

रविवार, 22 दिसंबर 2013

बिछने लगी है 2014 की विसात

45 बरस से कोई भी सरकार जिस क़ानून को बनाने की हिम्मत नहीं जुटा पायी, जिस क़ानून को बनाने लिए के सड़कों पर बड़े- बड़े आंदोलन हुए, आखिर वह लोकपाल क़ानून बिना किसी रुकावट के संसद में पास हो गया,क्या यह चमत्कार था या यह मान लिया जाए कि एक लोकतंत्र की राजनीति सुधर रही है,पारदर्शिता आ रही है,  या यह मान लिया जाए कि पार्टियां आने वाले आम चुनाओ के लिए सियासी विसात बिछा रही हैं ,क्योंकि पहली बार कोई पार्टी हर फैसला जनता की राय लेकर करना चाहती है और सरकार बनाएं कि नहीं यह जानने के लिए जनता के बीच जाकर सभाएं कर रही हैं, वहीँ दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी उसी पार्टी को समर्थन देने के लिए आमादा है जो उसे विलेन बनाकर चुनाव जीती है, लेकिन आम आदमी पार्टी की परेशानी यह है कि उसे सरकार बनाने से ज्यादा चिंता अपने आत्मसमान और साख की है, क्योंकि उसने जनता से वादा किया था कि वह भ्रष्टाचारियों से किसी भी हालत में दोस्ती नहीं करेंगे,

 सरकार बनाने के किये जोड़-तोड़ के तिकड़म करने में माहिर भाजपा भी सत्ता से दूर ही रहना चाहती है,आखिर क्यों ? जबकि भारत की राजनाति के पन्नो को पलटें तो यही मिलेगा कि चुनाव जीतने के बाद चुनावी वादे तो दूर की बात है पार्टियों ने जनता के बीच आना भी उचित नहीं समझा, तो क्या मौजूदा हालात देश के राजनीतिक तौरतरीकों में बदलाव का इशारा कर रही है, जब हर कोई पार्टी सत्ता पाने के लालच से इतर जनता में अपनी साख और भरोसा जगाना चाहती है, क्योंकि दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाओ में जिस तरह जनता ने भाजपा कांग्रेस को खारिज कर एक नयी पार्टी को जिताकर यह संकेत दिया कि वो बदलाव चाहती है, कहीं जनता के इस मेसेज से पारम्परिक पार्टियां डर और सहम तो नहीं गयी हैं, इसलिए 2014 में आने वाले आम चुनाओ के लिए कोई गलती नहीं करना चाहती हैं,
इस सच्चाई को किसी भी तरह ख़ारिज नहीं किया जा सकता कि आम आदमी पार्टी ने दिल्ली चुनाओ में जिस ट्रांस्परेंसी से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की उसने अन्य पार्टियों को भी इसी राह पार चलने को मजबूर कर दिया है कि अगर आम आदमी को नजरअंदाज करोगे तो सत्ता बदल दी जायेगी, देश की राजनीति में बदलाव की यह शुरुआत तो आम आदमी पार्टी ने शुरू की है, भले ही वह अपने चुनावी वायदों पर खरी उतरे या नहीं ,
दिल्ली विधान सभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने शायद यह सोचा भी नहीं होगा कि इतनी बड़ी जीत मिल जायेगी इसलिए उसने ऐसा एजेंडा बनाया जिससे आम आदमी में भरोसा जगे, उसने आधारभूत समस्याओ को ही आधार बनाया और वादा किया कि वह लोगों को बिजली पानी सस्ते दामों पर दिलवाएगी, पार्टी की ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि देखकर लोगों ने भरोसा किया और बड़ी जीत दिलवायी, अब जनता और विपक्षी पार्टिया दबाव बना रही हैं कि सरकार बनाओ और वादे पूरे करो, वादे भले ही मुश्किल हो लेकिन आम आदमी पार्टी 2014 के चुनावो में उतरने का पूरा मन बना चुकी है, इसलिए आम आदमी को समर्थन देने का कोंग्रेसी दांव उसे भारी भी पड़ सकता है, क्योंकि आम आदमी पार्टी 2014 को लेकर सारे देश में अपना नेटवर्क बना चुकी है कई राज्यों यूपी उत्तराखंड में अपने दफ्तर भी खोल चुकी है, और अगर आम आदमी पार्टी को 2014 के चुनाओ से पहले कुछ महीने सरकार बनाने का मौका मिलता है तो वह अपने किये वादों को पूरा करने की कोशिश करेगी, जिससे जनता में एक सकारात्मक सन्देश जाए भले ही इन वादों कि भरपाई का असर कैसा भी हो, अगर आम आदमी पार्टी यह काम कर गयी तो 2014 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस और भाजपा के लिए किसी खतरे से कम नहीं होगा,

सोमवार, 9 दिसंबर 2013

आप की जीत क्या बदलाव का संकेत है ?

भारतीय राजनीति में यह पहली बार नहीं हुआ है जब आदोलन की पृष्ठभूमि से निकली एक नयी पार्टी ने बड़े -बड़े दिग्गजों को धराशाही कर दिया. पहले भी ऐसे मौके कई बार आये जब जनता ने  जम्हूरियत का जीता जागता उदाहरण दिया. बात तब चाहे 1975 में इंदिरा के खिलाफ  जेपी के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन से निकले लालू की हो!  या फिर आंध्र क्रांति से निकले  एनटीआर की हो, जब जब स्थापित पार्टियों ने जनसरोकारी राजनीति से इतर आम आदमी की नहीं सुनी तब-तब जनता ने नए राजनीतिक विकल्प तलाश की लेकिन जनता ने जिन्हे विकल्प के रूप में देखा उनकी राजनीति भी आगे चलकर उसी भ्रष्ट राजनीति का हिस्सा बन गयी. इसीलिए यह सवाल उठना लाज़मी है कि आंदोलन के गर्भ से निकली दिल्ली की आम आदमी पार्टी कुछ अलहदा कर पायेगी या नहीं ?
   
 इस पार्टी का भविष्य चाहे जो भी हो लेकिन दिल्ली में एक साल की आम आदमी पार्टी ने जिस तरह भाजपा और कांग्रेस जैसी बड़ी और स्थापित पार्टियों की जड़ें हिलायी है वह साफ़ संकेत देती है कि मौजूदा वक़्त में लोग बदलाव की राजनीति चाहते हैं, जो कि भ्रष्टाचार मुक्त हो. इन चार राज्यों में हुए चुनावो ने यह जतला भी दिया है, पिछले 10 सालों से केंद्र में राज कर रही कांग्रेस पार्टी के कार्यकाल में कई घोटाले हुए. महगाई बढ़ी, विकास दर कम होती गई, जनता में एक आक्रोश था ,शायद चार राज्यों में कांग्रेस की हार का प्रमुख कारण केंद्र सरकार के खिलाफ एंटीइनकम्बेंसी ही बनी. चुनाव परिणाम के बाद राहुल गांधी को केजरीवाल से  सीख लेनी चाहिए कि भ्रष्ट व्यवस्था से परेशान जनता  में विश्वास कैसे जगाया जाये, चुनाव परिणामों के बाद राहुल गांधी ने मीडिया से अपनी प्रतिक्रिया में ये कहा भी कि युवाओ को न जोड़ना हमारी गलती रही, भाजपा और कांग्रेस की ही बात करें तो ये युवावो को मौका देने की बात तो करते रहे लेकिन परिवार वाद इन पार्टियों में हमेशा हावी रही. चार राज्यों में हुए चुनावो पर ही नजर डालें तो मध्य प्रदेश , छत्तीसगढ़ . राजस्थान , और दिल्ली में कई नेताओ के ही बेटों या बेटियों को टिकट दिए गए, दिल्ली की बात करें तो भाजपा के विजय जौली, साहिब सिंह वर्मा, के बेटे चुनाव में खड़े थे, उसके इतर आम आदमी पार्टी ने कई ऐसे पढ़े-लिखे युवावों को टिकट देकर  विधायक बना दिया जो कल तक रोजगार की तलाश में सड़कों पर थे, व्यवस्था परिवर्तन के लिए सड़कों पर आंदोलन का हिस्सा थे, और उसी आम युवा ने दिल्ली चुनावों में बड़ी पार्टियों के दिग्गजों को कुर्सी से बेदखल कर दिया, शायद यही लोकतंत्र की खूबसूरती है, कि जनता जन जाये तो व्यवस्था तो उसकी मुठ्ठी में है, दिल्ली के चुनाव परिणामों ने एक सवाल तो हर एक के जेहन में खड़ा कर दिया है  कि अगर आगामी लोकसभा चुनावों में देश को कोई भरोसेमंद रानीतिक विकल्प मिले तो जनता भाजपा और कांग्रेस से इतर उसे तरजीह दे सकती है, बशर्ते भारत जैसे भौगोलिक विषमता वाले देश में जहाँ हर वोटर पढ़ा लिखा नहीं है, पीएम को लेकर उनके जेहन में इंदिरा से आगे बात बढ़ती ही नहीं और वो आज भी गांधी और अटल को ही देखकर वोट डालते हैं उनको अन्ना जैसे लोग को जागरूक करते रहे,
क्या देश जाग रहा है ? क्योंकि देश मैं सेक्युलर विचारधारा का हूँ... मैं साम्यवादी  विचारधारा  का हूँ... , और मैं हिन्दू,विचारधारा का हूँ, ....जैसे नेताओं के चुनावी हथियारों ने  लोगों को खूब ठगा है,   मजहब के नाम पर वोट पाने वाली राजनीती इन चार राज्यों में हुए चुनावों में कमजोर होती हुई दिखी, हिन्दू पार्टी समझी जाने वाली भाजपा को मध्य प्रदेश में मुसलमानों का भी खूब साथ मिला, वही राजस्थान में अशोक गहलोत का वोटबैंक कहे जाने वाली मीणा गहलोत का साथ  छोड़ते दिखे, तो क्या ये मान लिया जाये कि धर्म की राजनीति का तिलिस्म भी धीरे- धीरे  खत्म होता जा रहा है?  और यह चुनाव इसका संकेत मात्र है, ....इससे आगे की चर्चा अगले पोस्ट में करूँगा.......

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

तरुण, तहलका और पत्रकारिता की त्रासदी का युग

सुनील रावत: वर्ष 2001  मे तरुण तेजपाल ने तहलका डॉट कॉम के जरिये  भाजपा के नेता बंगारू लक्ष्मण  को रिश्वत लेते कैमरा में कैद कर के तहलका मचा दिया था, और उसके बाद मैच फिक्सिंग करते खिलाड़ियो और बुकियों को बेनक़ाब करना हो या गुजरात दंगों में अपने स्टिंग ऑपरेशन  "कलंक" के जरिये  माया कोडनानी और बाबू बजरंगी की संलिप्तता दिखाकर उनको सलाखों के पीछे  भेज  दिया, ऐसे  कई खुलासों ने तहलका और तरुण तेजपाल को पत्रकारिता जगत में एक पहचान दिला दी ,  तहलका की  खोजी पत्रकारिता  लगातार जारी रही. तहलका अपनी खोजी पत्रकारिता के लिए जाना माना नाम बन  गया.

 20 से 30 साल के युवा पत्रकारों की टीम ने तहलका के जरिये मीडिया के कॉर्पोरेट दौर में सरोकारी और सत्ता पर असर करने वाली पत्रकारिता का विश्वास जगाया, लेकिन ये अपने तरह का पहला मामला है कि जिस व्यक्ति ने तहलका को खड़ा किया और सफलता की बुलंदियों तक पहुँचाया आज वही व्यक्ति खुद तहलका के लिए त्रासदी बना हुआ है, और वो भी अपनी पत्रकारिता के कारण नहीं बल्कि अपनी एक एक ऐसी करतूत से जिसका पत्रकारिता का दूद दूर तक कोई लेना देना नहीं. तेजपाल पर  उन्ही की एक सहयोगी लड़की ने गोवा में एक समारोह के दौरान सेक्सुअल असाल्ट करने का आरोप लगाया. और तेजपाल ने अपनी गलती को मान भी लिया और अपने पद से 6  महीने के लिए त्यागपत्र दे दिया. हालाँकि उन्हें असली सजा तो क़ानून देगा, लेकिन संयोग देखिये जिस तरुण तेजपाल के कारण अधिकतर युवा तहलका के जरिये पत्रकारिता करना चाहने थे, आज उसी तेजपाल के कारण कई पत्रकार तहलका छोड़ रहे है, जिनमे शोभा चौधरी,राणा अयूब, जैसे कई नाम हैं,
हालाँकि कुछ लोग इस दौर में तेजपाल के इस निजी कृत्य के कारण तहलका और उसकी पत्रकारिता पर लगातार हमले कर रहे हैं.  जो कि उचित नहीं है, तरुण तेजपाल ने जो किया वो अपराध की श्रेणी में आता है, ये पूर्णतः घृणित अपराध है, दोषी सिद्ध होने पर कड़ी से कड़ी सजा भी मिलनी चाहिए, और एक बड़े पत्रकार के लिए तो यह बहुत ही शर्मनाक है, क्योंकि पत्रकारिता सिर्फ एक पेशा नहीं बल्कि समाज की वो आदर्श स्थिति है जिससे सामाजिक ताना-बाना सीधे सीधे जुड़ा हुआ है, पत्रकार का काम सिर्फ ख़बरों को पहुचाना मात्र नहीं है बल्कि समाज को रास्ता दिखाना भी है,खैर मुद्दे पर लौटते है, तेजपाल ने जो किये उससे निपटना क़ानून का काम है, लेकिन तेजपाल के कारण तहलका और पत्रकारिता पर हमला करना उचित नहीं होगा, क्योंकि तहलका आज के दौर में तरुण तेजपाल के कारण  ही नहीं बल्कि उससे इतर तहलका में  काम करने वाले कई युवा पत्रकारों के कारण भी जाना जाता है, तेजपाल ने कई सत्ताधारियों की चूलें हिलायी हैं, इसलिए उनके विरोधियों की संख्या भी सम्भवतः अधिक होगी,कहावत है कि एक बुराई सौ अच्छे कर्मो को मिटटी में मिला देती है,  तेजपाल के इस अपराध ने विरोधियों को हमला करने का मौका तो दिया ही है साथ ही तहलका की पत्रकारिता पर भी हमला करने का सुनहरा मौका विरोधियों को दिया है,  कई लोग सवाल उठा रहे हैं  कि तहलका के स्टिंग भाजपा पर ही क्यों होते हैं लेकिन सवाल यह नहीं होना चाहिए क्योंकि यह कतई जरूरी नहीं किसी एक पार्टी कि चोरी पकड़ में आयी है तो दूसरी पार्टी की चोरी भी उसी के द्वारा पकड़ी जानी चाहिए थी.  अगर किसी पार्टी का भ्रष्टाचार पकड़ा गया है तो इसका मतलब चोरी हो रही थी तभी पकड़ी गई,
 कई पत्रकार भी इसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं, ये वही लोग है जो खुद पत्रकार होकर निष्पक्ष न होकर पार्टीवादी मानसिकता रखते है, ऐसे दौर में जब अखबारों और टीवी चैनलो पर राजनैतिक पार्टियों की  चाटुकारिता के आरोप लग रहे है तब पत्रकारों का एकजुट होना जरूरी है, क्योंकि डर  इस बात का है कि जनता का मीडिया को लेकर जो पार्टीवादी परसेप्शन बनता जा रहा है कही उसकी आड़ में जनता के असल मुद्दो और महत्व रखने वाले समाचारों की मृत्यु न हो जाये, देश के तमाम मीडिया संस्थानो को अपनी साख बचानी होगी, वरना ऐसे लोकतान्त्रिक देश के लिए जहाँ जनता सरकार  चुनती है, और मीडिया सरकार बनाने के लिए जनमत बनाने का सबसे बड़ा माध्यम है इसलिए इस चौथे खम्भे को मजबूत करना जरूरी है,  देश में पत्रकारिता को सुधारना होगा, क्योंकि पिछले कुछ बरस में लोकतंत्र की  निगरानी करने वाला चौथा स्तम्भ मीडिया भी लगातार राजनीतिकरण का शिकार हुआ है और तथाकथित पत्रकारों और संपादको कि करतूते पत्रकारिता के लिए त्रासदी बनती जा रहा है.
आज देश में सैकड़ों अख़बार और टीवी चैनल है, लेकिन आम आदमी कि परेशानी ये है कि वह किसकी ख़बरों पर भरोसा करे,क्योंकि सबकी मानसिकता यह हो चली है कि ये चैनल भाजपा वालों का है और ये कांग्रेस का, क्योंकि इन अखबारों और चैनलो की  पहचान भी भाजपा कांग्रेस से जुड़ती जा रही हैं, और ऐसे सम्पादकों की कमी नहीं जिनका सम्बन्ध किसी राजनैतिक पार्टी से न हो, गूगल सर्च करेंगे तो कई ऐसे पत्रकारों के बारे में जानने का मौका मिलेगा जो पत्रकारिता करते- करते पिछले दरवाजे पिछले दरवाजे से राजनैतिक पार्टी में शामिल हो गए, पंकज पचौरी एनडीटीवी से मनमोहन के मीडिया सलाहकार बन गए, इसके अलावा अरुण सौरी, चन्दन मित्रा और हिंदुस्तान अख़बार के संपादक, कई उदाहरण है, तो समझिये कि जिस पत्रकारिता के आसरे आम आदमी सरकार या अपने नेताओ को परखता है बल्कि पब्लिक परसेप्शन भी  बनाता है, वही मीडिया निष्पक्ष न होकर पार्टियों कि चापलूसी करने लगा है, अब चैनलों और अख़बारों का इस्तेमाल गलत काम करने वाली सरकार को हटाने नहीं बल्कि बचाने के लिए होने लगा है, चुनावी मौसम में कई अख़बार और टीवी चैनल पनपने लगे है, क्योंकि कमाई करने का यही सुनहरा मौका होता है, जिंदल और ज़ी न्यूज़ प्रकरण हो या 2जी स्पैट्रम या फिर तहलका के संपादक तरुण तेजपाल की ताज़ा करतूत, सभी ने पत्रकारों की विश्वसनीयता की साख पर बट्टा लगाया है,

शनिवार, 16 नवंबर 2013

कई सचिन पैदा कर गए सचिन

24 बरस पहले 15 नवंबर 1989 को जब कराची में सचिन ने  पाकिस्तान के खिलाफ टेस्ट मैच से टेस्ट कैरियर  की शुरुआत की  तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि ये छोटे कद का खिलाड़ी क्रिकेट के एक युग का परिचायक बनेगा। 14 नवंबर 2013 को अपने घरेलू मैदान वानखेडे में वेस्टइंडीज के खिलाफ अपना 200वां टेस्ट खेलकर क्रिकेट को अलविदा कह दिया।  सचिन के सन्यास के बाद मानो क्रिकेट का एक युग के खत्म होने जैसा है, क्रिकेट जब तक रहेगा शायद तब-तब हर-एक के जेहन में एक नाम याद  आएगा " सचिन रमेश तेंदुलकर "।

 आने वाली पीढ़ी जब पीछे मुड़कर देखेगी तो वो जरूर सोचेगी ये सचिन कैसे खेलता होगा। जिसके नाम दुनिया भर के रिकॉर्ड कायम हैं। 15,921 टेस्ट रन,  18,426 एकदिवसीय रन, 51 टेस्ट सतक, 49 एकदिवसीय सतक, कुल मिलकर 100 सैकड़े, एकदिवसीय में पहला दोहरा सतक बनाने वाला खिलाडी, लेकिन जिन्होंने सचिन को खेलते देखा है वो अपनी इस उपलब्धि से गदगद होंगे कि हमने तो सचिन को खेलते हुए देखा है। ये ढाई दसक इतिहास को सुनहरा बना चुके हैं, या यूँ  कहें कि सचिन का मतलब है क्रिकेट और क्रिकेट का सचिन,  मात्र सात बरस कि उम्र में बल्ला थामा  और तब से सिर्फ क्रिकेट ही खेला  और क्रिकेट ही सोचा,  अब जब 24 बरस बाद सचिन क्रिकेट को अलविदा कह रहे सचिन तो सबके मन में  एक सवाल उठना लाजमी है कि अब सचिन क्रिकेट से दूर कैसे रह पाएंगे?  सचिन नाम सिर्फ एक खिलाड़ी का नाम नहीं बल्कि एक नाम समर्पण की मिशाल का  भी है, जिसने अपने समर्पण से अपने हुनर को इस बुलंदी तक पहुंचाया कि पूरी दुनिया इस लिटिल मास्टर का लोहा मानने  को मजबूर हो गयी, अगर अगर बीते 24 बरस की  बात करें तो देश में बहुत कुछ बदला, देश ने कई प्रधानमंत्री देखे, क्रिकेट में मैच फिक्सिंग जैसी घटनाएं हुई, कई घोटाले हुए, दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश के सियासतदानो और व्यवस्था से जनता का विश्वास उठा,  लोग सड़कों  पर उतरे, लेकिन इन सबसे से इतर 24 बरस में एक सख्स ऐसा भी था जो हमेशा अपने कर्त्तव्य पर अडिग रहा। जब सीमा पर भारतीय सैनिक युद्ध में अपनी जान  गवां रहे थे तब सचिन लगातार पाकिस्तानी गेंदबाजों के छक्के छुड़ा रहे थे, इमरान खान, वकार यूनिस वसीम अकरम, जैसे गेंदबाजो को सबक सिखा रहे थे।
 अगर आज भारत क्रिकेट में दुनिया में आज नंबर है तो इसमें सचिन तेंदुलकर का महत्व पूर्ण योगदान है। आज अगर भारत में महेंद्र सिंह धोनी, युवराज, विराट कोहली, रोहित शर्मा जैसे खिलाडी है तो इन सबका प्रेरणाश्रोत सचिन ही हैं  जो 16 साल कि उम्र से लगातार देश के इन युवाओ को सर्वश्रेष्ठ  और तकनीक से भरपूर क्रिकेट कवर ड्राइव, स्ट्रैट ड्राइव, पुल, हुक, जैसे शॉर्ट दिखाते रहे। जब मुम्बई के वानखेड़े में अपनी अंतिम पारी सचिन खेल रहे थे तो ऐसा लग रहा था कि मानो  सचिन क्रिकेट प्रेमियों  आज भी  वही सर्वश्रेष्ठ  क्रिकेट स्ट्रोक दिखाना चाहते हो, शॉट खेलने में वही तत्परता, क्रिकेट में पूरी तरह डूबे हुए, गेंदबाज के हाथ से लेकर बाउंड्री के पार जाने  तक गेंद पर पूरी निगाह, जबकि क्रिकेट के इस भगवान् की अंतिम पारी का साक्षी बनने के लिए दुनिया भर की मीडिया का जमावड़ा था। उनके गुरु रमाकांत आचरेकर, उनकी माँ, बीवी बच्चे,  फिल्मी सितारों से लेकर, सियासत के खिलाडी तक मौजूद थे, और ऐसे में उनके खेल की एकाग्रता पर असर पड़ना लाज़मी है, लेकिन सचिन के खेल में ऐसा कुछ लगा नहीं, वो तो बस गेंदो से मुक़ाबला  करने में मगशूल थे।
 अपनी अंतिम पारी के बाद सचिन ने जो कहा वो सुनकर लाखों लोगों के आँखों में आंसू थे कि अब सचिन मैदान पर नहीं दिखेंगे। ये एक महान खिलाडी के ही गुण है कि, इतना बड़ा खिलाडी होने के बाद भी, एक पति, शिष्य, बेटा, भाई की  भूमिका भी वो सहजता से निभाते रहे, भारत रत्न किसी खिलाड़ी को मिले यह चर्चा भी शायद सचिन जैसे खिलाड़ी के कारण ही सम्भव हो पाया, सचिन जैसा खिलाडी सदी में सिर्फ एक ही बार पैदा होता है। इन 24 बरस में सचिन ने अपने सर्वश्रेष्ठ खेल से देश ही नहीं पूरी दुनिया को कई सचिन दिए हैं। पूरे अंतराष्ट्रीय क्रिकेट में कई खिलाड़ी आये, शायद ही 90 के दसक के बाद का कोई ऐसा गेंदबाज हो जिसको सचिन ने न खेला हो, भारतीय टीम में ही कई ऐसे खिलाड़ी है हैं जिनकी पैदाइस सचिन के क्रिकेट करिएर से छोटी है।  अब आने वाली पीढ़ी में शायद ही कोई ऐसा खिलाड़ी होगा जो 24 बरस तक देश के लिए  क्रिकेट खेलता रहेगा।

गुरुवार, 31 अक्टूबर 2013

सरदार पटेल कहीं मोदी का नया सियासी पैंतरा तो नहीं ?


इतिहास के लिहाज से 31  अक्टूबर का दिन बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि  आज देश के दो  महान व्यक्तित्वों  को पूरा देश याद  कर रहा है, इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि और सरदार पटेल की की जन्मतिथि और आज के दौर में राजनैतिक पार्टियों द्वारा उन्हें कैसे याद किया जा रहा है, ये भी जरा देखिये,  31 अक्टूबर 2013 को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात की नर्मदा नदी पर स्थित सरदार सरोवर बांध पर लौह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल की  मूर्ती, "स्टेचू  ऑफ़ यूनिटी"  का उनकी जन्म तिथि पर  शिलान्यास करने जा रहे हैं, अपने अनेको भाषणो में मोदी पटेल का ज़िक्र भी करते रहे हैं, मोदी ने अपने भाषण में यहाँ तक कहा है कि काश सरदार साहब देश के पहले प्रधानमंत्री होते तो देश कि स्थिति आज कुछ और होती, बीजेपी के रविशंकर कहते है कि देश कि देश की ज्यादातर रियासतों को विभाजन के बाद सरदार पटेल ने ही सम्भाला था, और कश्मीर को नेहरू जी ने हैंडल किया था इसलिए वहाँ आज भी विवाद जारी है, सरदार पटेल गुजरात में जन्मे एक खांटी हिन्दू थे,  तो क्या  भाजपा पटेल को अपने पाले में डालकर देश में एक नयी सियासत को जन्म दे रही है, लेकिन एक दूसरा सच यह भी है कि गांधी नेहरू और पटेल ने ही भारत को एक धर्म निरपेक्ष देश बनाने का सपना देखा था और और गांधी जी के सबसे करीबियों में सरदार पटेल माने जाते थे,  जब 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी कि हत्या की तो देश के गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ही थे, और उन्होंने इस बात  को स्वीकार किया था  कि सुरक्षा में चूक से गांधी जी की  हत्या हुई, महात्मा गांधी कि मौत से सरदार पटेल बड़े सदमे में थे और उसके कुछ ही महीने के बाद सरदार सरदार पटेल को दिल का दौरा पद गया था, यहाँ तक कि  हत्या में हिंदू चरमपंथियों का नाम आने पर पटेल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को प्रतिबंधित कर दिया और संघ संचालक एमएस गोलवरकर को जेल में डाल दिया गया। रिहा होने के बाद गोलवरकर ने उनको पत्र लिखे। 11 सितंबर, 1948 को पटेल ने जवाब देते हुए संघ के प्रति अपना नजरिया स्पष्ट करते हुए लिखा कि संघ के भाषण में सांप्रदायिकता का जहर होता है.. उसी विष का नतीजा है कि देश को गांधी जी के अमूल्य जीवन का बलिदान सहना पड़ रहा है। वही कांग्रेस भी गांधी नेहरू के नाम पर इस देश के भीतत हमेशा सियासत करती रही है, और मौजूदा वक़्त में गांधी नाम ही कांग्रेस पार्टी का सबसे वोट पाने हथियार रहा है, कांग्रेस ने इसका इस्तेमाल देश में अनेको कल्याणकारी योजनाओ, सड़को, मैदानो तथा हवाई अड्डों के नाम गांधी नेहरू के नाम पर रख कर वोट खीचने का काम हमेशा किया है,
आज 31 अक्टूबर को देश कि पहली महिला प्रधान मंत्री और लौह महिला इंदिरा गांधी को भी याद करने का दिन है, इंदिरा गांधी जैसा ब्यक्तित्व देश में सदियों में एक आध बार ही पैदा होती है, उनकी कुशल राजनीति और क्रांतिकारी फैसलों के कारण ही देश ने पकिस्तान को युद्ध में हरा कर दो टुकड़ो में बाँट दिया था, इंदिरा गांधी की हत्या 31 अक्टूबर 1984 को कर दी गई। इनके पूरे राजनीतिक जीवन में ढ़ेर सारे विवाद जुड़े। इनका व्यक्तिगत जीवन भी विवादों के साए में रहा। इन पर तानाशाही और हर हाल में सत्ता बनाए रखने का आरोप लगता रहा। इनसे जुड़ा सबसे बड़ा विवाद आपातकाल और ऑपरेशन ब्लू स्टार है। 26 जून 1975 को संविधान की धारा- 352 के प्रावधान के अनुसार आपातकालीन स्थिति की घोषणा कर दी गई। इस पर पूरे देश में काफी हो हल्ला मचा। और इंदिरा गांधी जी कि हत्या का कारण भी यही ओप्रशन ब्लूस्टार बना, लेकिन इंदिरा गांधी जैसा नेतृत्व करने वाला प्रधान मंत्री आज के दौर में बहुत मुश्किल है,